ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराज्य सुखका त्याग करना । ऐसा कहे विलासीका भी मन । एकांतमें यहीं बैठा रहना । ऐसा ही लगे ॥ १७० ॥ स्थान वह ऐसा हो उत्तम । तथा अत्यंत पवित्रतम । प्रकटे अधिष्ठान परम । नयनोंमें वहां ॥ ७१ ॥ देखना औ एक विशेष लक्षण । होना वहां साधक-वसति-स्थान । न होना जन संचार प्रच्छन्न । अर्जुन वहां ॥ ७२ ॥ वहां अमृतके समान । पक्व फल वृक्ष अर्जुन । फलते रहे अनुदिन । सभी ओर ॥ ७३ ॥ पग पगमें बहे नीर । वर्षा ऋतुमें भी पवित्र । ऐसे जो सहज निर्झर । सुलभ हो वहां ॥ ७४ ॥ आतप भी हो कोमल । सौम्यता भासे शीतल । पवन अति निश्चल । मंदमंद हो ॥ ७५ ॥ अधिक तर हो निःशब्द । न करें आकुल श्वापद । शुक तथा न हो षट्पद । उस स्थानमें ॥ ७६ ॥ स्रोत समीप हो हंस । वैसे दो चार सारस । कूजन करें आस पास । कोयल कभी कभी ॥ ७७ ॥ किंतु जो निरंतर नहीं । आवे जावे कभी कहीं । मोरको अपनी ना नहीं । उस स्थानमें ॥ ७८ ॥ परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना । वहां निगूढ़सा मठ होना । या शिवालय ॥ ७९ ॥ इन दोनोंमें एक । भाता है जो अधिक । एकांतमें अधिक । बैठा रहना ॥ १८० ॥ देखें कैसा है यह स्थान । स्थिर रहता है क्या मन । रहा तो लगाना आसन । इस भांति ॥ ८१ ॥ योग साधनामें आसन ऐसा होना चाहिये-- वहां शुद्ध मृगचर्म एक बिछाना । उसपे धौत वस्त्रकी तह डालना । उसके तलमें कोमलसे बिछाना । कुशांकुर ॥ ८२ ॥ १६८