ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टि रहती अंतरमें । पैर रखे तो बाहरमें । बैठती है नासिकाग्रमें । स्थिर होके ॥ ४ ॥ दृष्टि रहती अंदर ही अंदर । आती नहीं वह हठसे बाहर । होती तभी अर्ध दृष्टि है स्थिर । नासिकाग्रमें ॥ ५ ॥ दिशाओंका दर्शन करना । रूप राशीकी राह देखना । मिटे दृष्टिकी लत संपूर्ण । अपने आपमें ॥ ६ ॥ होगा फिर कंठनाल संकुचित । चिबुक छूता कंठ अरिक्तकागर्त । स्थिर होके फिर दबाती सतत । वक्ष स्थलमें ॥ ७ ॥ होता फिर कंठमणि लोप । उसपे हो बंधका आरोप । कहलाता जालंदर आप । पांडुकुमार ॥ ८ ॥ होता है जो नाभी पर पृष्ठ । उदर हो अंदर आकृष्ट । अंतरंगमें खिलता कोष्ठ । हृदय-कोषका ॥ ९ ॥ स्वाधिष्ठानके उत्तरानसे । नाभिस्थानके अधोभागसे । बढ़ता बंध जिस नामसे । वह उड्डियान ॥ २१० ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥ इस योग-साधनका, विस्तार, परिणाम, अनुभव,— ऐसे शरीरके बाहर । पड़ा अभ्यासका पाखर । मनका चांचल्य भीतर । धीमा पडता ॥ ११ ॥ कल्पना है मिटती । प्रवृत्ति भी घटती । तन-मनको शांति । मिलती आप ॥ १२ ॥ क्षुधा गयी है कहां । निद्रा रहती कहां । न है स्मरण यहां । मनमें भी ॥ १३ ॥ शांत निर्भय मच्चित्त व्रतस्थ ब्रह्मचर्यमें । साधके मनको नित्य मुझमें ही लगा रहे ॥ १४ ॥ १७१ आत्म-संयमयोग