भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मूलबंधमें रहा हुआ अपान । ऊर्ध्व आया पाकरके आकुंचन । पा करके अध ऊर्ध्व आकुंचन । फूल उठता वह ॥ १४ ॥ क्षुभित हो खौलके उन्मत्त । घेरेमें गरजता सतत । मणिपूरकको करे आघात । रह रह कर ॥ १५ ॥ फिर वह अपानका बवंडर । शोधन करता संपूर्ण शरीर । बालपनका सडा गला जहर । बाहर करता ॥ १६ ॥ अंदर कहीं नहीं मुड सकता । फिर उदरमें संचार करता । वहां वह नाम भी नहीं रखता । कफ पित्तका ॥ १७ ॥ धातुके सागर उलटता । मेदके पर्वतोंको तोडता । अंदरकी मज्जा निचोडता । अस्थिगत भी ॥ १८ ॥ नसोंको खुल करता । गात्रोंको ढील करता । साधकको भी डराता । डरना नहीं ॥ १९ ॥ रोगोंको उठाकर दिखाता । किंतु उनको मिटा भी देता । आप औ' पृथ्वीको सान देता । एक जीव-सा ॥ २२० ॥ एक ओर जब यह होता । वहां जो आसनकी उष्णता । करती है शक्तिको जागृत । कुंडलिनीकी ॥ २१ ॥ नागका पिल्ला हो जैसे । स्नान कर कुंकुमसे । मुडकर आया जैसे । सेज पर ॥ २२ ॥ ऐसी वह कुंडलिनी । साडेतीन घुमावनी । अधोमुख सर्पिनी । सोती रहती जो ॥ २३ ॥ जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य विवेचन-- कडी जैसी वह विद्युल्लताकी । तह जैसी अग्निकी ज्वालाओंकी । सांखलसी चमकीली स्वर्णकी । रहती है पार्थ ॥ २४ ॥ सुव्यवस्थित जो सिकुडी हुई । संकुचित स्थानमें सोई हुई । वज्रासनके चिमटेमें फंसी हुई । होती है सावध ॥ २५ ॥ गिरा वहां मानो नक्षत्र टूटकर । या आया स्थानच्युत हो स्वयं भास्कर । अथवा तेज बीजमें फूटा अंकुर । प्रकाश रूप ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी १०२