भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अपनें कुंडल खोलकर । लीलसे ही अंग मोडकर । कुंडलिनी नाभिकंद पर । टूट पडती ॥ २७ ॥ बहुत दिनकी रहती भूखी । छेडनेसे होती है अति तीखी । आवेशसे होकर ऊर्ध्वमुखी । उठती है जो ॥ २८ ॥ वहां हृदय-कोशके निम्न । भागमें रहता जो पवन । उसे पकडकर अर्जुन । निगलती वह ॥ २९ ॥ अर्जुन ! मुखकी ज्वालाओंसे । निगलती ऊपर नीचेसे । मांस खंड संपूर्ण-रूपसे । शरीरके ॥ २३० ॥ जो जो स्थान हैं समांस । वहांका भरती ग्रास । लेती है दो चार ग्रास । हृदयका भी ॥ ३१ ॥ करती फिर तलुओंका शोधन । तथा ऊर्ध्व खंडका भी है भेदन । चाटती अंगका प्रत्येक स्थान । वह धनंजय ॥ ३२ ॥ न छोडे अपना आश्रय । नामका भी रक्त संचय । रखे शुद्ध चर्मवलय । अस्थिपंजरपे ॥ ३३ ॥ अस्थि-नलियोंको सोखती । शिराओंको भी चूस लेती । बाह्य वृद्धिको जलादेती । रोमकूपके ॥ ३४ ॥ सप्त-धातुके जो सागर । प्यारसे घोंट भर कर । रखती सब ,सुखाकर । ग्रीष्म कालसा ॥ ३५ ॥ नासापुटिका जों श्वास । जाता अंगुल द्वादश । बीचमें धर अशेष । खींचती भीतर ॥ ३६ ॥ अधो-भागसे होता तब आकुंचित । ऊर्ध्व-भागसे होता खींचाव सतत । उस भेंटमें केवल चक्रके दांत । रहते बचकर ॥ ३७ ॥ ऐसे होता इन दोनोंका मिलन । किंतु मध्य कुंडलिनी क्षोभ पूर्ण । पूछती है उनसे "तुम हो कौन ? । चलो यहां से" ॥ ३८ ॥ पार्थिव धातु वह अशेष । निगलती वह रख शेष । आपको भी वैसे ही अशेष । पी जाती है ॥ ३९ ॥ दोनों भूतोंको निगल कर । देती है जो तृप्तिकी डकार ! तब वह संतुष्ट होकर । रहती सुषुम्नाके पास ॥ २४० ॥ १७३ आत्म-संयमयो