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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अपनें कुंडल खोलकर । लीलसे ही अंग मोडकर । कुंडलिनी नाभिकंद पर । टूट पडती ॥ २७ ॥ बहुत दिनकी रहती भूखी । छेडनेसे होती है अति तीखी । आवेशसे होकर ऊर्ध्वमुखी । उठती है जो ॥ २८ ॥ वहां हृदय-कोशके निम्न । भागमें रहता जो पवन । उसे पकडकर अर्जुन । निगलती वह ॥ २९ ॥ अर्जुन ! मुखकी ज्वालाओंसे । निगलती ऊपर नीचेसे । मांस खंड संपूर्ण-रूपसे । शरीरके ॥ २३० ॥ जो जो स्थान हैं समांस । वहांका भरती ग्रास । लेती है दो चार ग्रास । हृदयका भी ॥ ३१ ॥ करती फिर तलुओंका शोधन । तथा ऊर्ध्व खंडका भी है भेदन । चाटती अंगका प्रत्येक स्थान । वह धनंजय ॥ ३२ ॥ न छोडे अपना आश्रय । नामका भी रक्त संचय । रखे शुद्ध चर्मवलय । अस्थिपंजरपे ॥ ३३ ॥ अस्थि-नलियोंको सोखती । शिराओंको भी चूस लेती । बाह्य वृद्धिको जलादेती । रोमकूपके ॥ ३४ ॥ सप्त-धातुके जो सागर । प्यारसे घोंट भर कर । रखती सब ,सुखाकर । ग्रीष्म कालसा ॥ ३५ ॥ नासापुटिका जों श्वास । जाता अंगुल द्वादश । बीचमें धर अशेष । खींचती भीतर ॥ ३६ ॥ अधो-भागसे होता तब आकुंचित । ऊर्ध्व-भागसे होता खींचाव सतत । उस भेंटमें केवल चक्रके दांत । रहते बचकर ॥ ३७ ॥ ऐसे होता इन दोनोंका मिलन । किंतु मध्य कुंडलिनी क्षोभ पूर्ण । पूछती है उनसे "तुम हो कौन ? । चलो यहां से" ॥ ३८ ॥ पार्थिव धातु वह अशेष । निगलती वह रख शेष । आपको भी वैसे ही अशेष । पी जाती है ॥ ३९ ॥ दोनों भूतोंको निगल कर । देती है जो तृप्तिकी डकार ! तब वह संतुष्ट होकर । रहती सुषुम्नाके पास ॥ २४० ॥ १७३ आत्म-संयमयो

तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे । उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥ उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत । खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥ रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत । मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥

  • इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती । छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥ अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान । कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥ बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता । शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥ ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर। जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥ उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता । जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥ तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे । भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥ तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे । ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥ रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण । फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥ वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर । झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥ चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥ अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग । अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी १७४

या केशरसे भरा हुआ । सिद्ध रससे ढला हुआ । मूर्ति रूप उतरा हुआ । 'शांत-ब्रह्म ॥ ५५ ॥ अथवा आनंद त्रयका लेप । या महा सुखका प्रत्यक्ष रूप । या मानो संतोष-तरुका रोप । अति कोमल ॥ ५६ ॥ माना कनक-चंपककी कली । या अमृतसे ढली है पुतली । या वह कोमलता ही है खिली । अति कोमल हो ॥ ५७ ॥ ओससे शरद्ऋतुकी । प्रफुल्लता चंद्र-बिंबकी । या मूर्ति बैठी तेजकी । आसन पर ॥ ५८ ॥ योगीकी काया तब ऐसी बनती । कुंडलिनी जब चंद्रामृत पीती । देख डरता छूने वह देहाकृति । कृतांत भी तब ॥ ५९ ॥ बुढापा तब पीछे हठता । तारुण्यका भी वियोग होता । बीता हुआ बालपन आता । योगीका पार्थ ॥ २६० ॥ वयमें देखे तो वह इतनासा । कार्य उसका ब्रह्म पुरुषका-सा । धैर्यमें मानो मेरु पर्वत जैसा । होता निरुपम ॥ ६१ ॥ अंकुर ही है कनकद्रुमका । नित्य नूतन रत्नकी कलिका । वैसी ही उसकी नखाकृतिका । होता नवदर्शन ॥ ६२ ॥ उसके दांत भी नये उगते । किंतु वे अतिशय नन्हे होते । हीरेके कणसे वे चमकते । दुपंक्तियोंमें ॥ ६३ ॥ जैसे माणिकके कण । वे भी हो अणुसमान । आते हैं सर्वांगपूर्ण । रोमाग्र जो ॥ ६४ ॥ कर चरण तल । मानो हैं रातोत्पल । नयन जो निर्मल । कहूं कैसे ॥ ६५ ॥ मुक्ताके संपूर्ण खिल जानेसे । समेट न सकती शुक्त उसे । खुल जाता है फिर बंध जैसे । शुक्ति पल्लवोंका ॥ ६६ ॥ वैसे पलक पल्लवमें न समानेसे । दृष्टिके सर्वव्याप्त हो निकलनेसे । लिपट जाती है फिर गगनसे । जो पहले थी ॥ ६७ ॥ तन होता तब कंचनका । हलकापन आता वायुका । न होता अंश आप-पृथ्विका । अर्जुन वहां ॥ ६८ ॥ १७५ आत्म-संयमयोग

यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

वह फिर सागर पारका देखता । स्वर्ग लोकका भी विचार सुनता । चींटीका मनोगत भी है जान लेता । सहज भावसे ॥ ६९ ॥ पवनाश्वपर भी चढता । उदक पर वह चलता । ऐसी सिध्दियां प्राप्त करता । प्रसंग रूप ॥ २७० ॥ जो प्राणका हाथ पकडकर । गगनकी सीढियां बनाकर । सुषुम्नाका जीना चढकर । आयी हृदयमें ॥ ७१ ॥ वह कुंडलिनी जगदंबा । चैतन्य चक्रवर्तीकी शोभा । उसने विश्व बीजका कोंब । छायामें लिया ॥ ७२ ॥ आकार वह शून्य लिंगका । आवरण है परमात्माका । आसरा है जो खुला प्राणका । जन्मभूमिस ॥ ७३ ॥ ऐसी जो वह कुंडलिनी । हुई है हृदय-वासिनी । तब अनाहतकी ध्वनी । करती है ॥ ७४ ॥ शक्तिके तनमें चिपकनेसे । बुध्दिमें चैतन्य आया है जैसे । उसने ध्वनी सुनी है हौलेसे । अनाहतकी ॥ ७५ ॥ पोखरमें उस नादके । रुप दीखे नाद चित्रके । प्रणव रूप आकारके । रेखा लेखन ॥ ७६ ॥ करनेसे इसकी कल्पना । कल्पनासे इसको जानना । किंतु कल्पनाका मन लाना । कहांसे अब ॥ ७७ ॥ भूल गया मैं अर्जुन । नाश न होता पवन । जिससे है “ख” गगन । गूंजाता वह ॥ ७८ ॥ अनाहतकी उस घन गर्जनासे । गूंज उठता है हृदयाकाश जैसे । ब्रह्म-स्थानके महाद्वार हैं उससे । खुलते हैं सहज ॥ ७९ ॥ वहां कमल गर्भाकार अर्जुन । महदाकाश रहता अन्य जान । वहां रहता कर अर्ध भोजन । अतृप्त चैतन्य ॥ १८० ॥ सदनमें उस हृदयाकाशके । वास कुंडलिनी-परमेश्वरीके । अर्पण करती अपने तेजके । कौर चैतन्यको ॥ ८१ ॥ शाक सह वह बुध्दिके । देकर कौर हाथके । द्वैतको न देख सके । ऐसा करती ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी : १७६

ऐसी निज-कांतिको खोकर । केवळ प्राण-रूप होकर । ऐसी देखती है धनुर्धर । कहूंगा अब ॥ ८३ ॥ कोई पुतली ही हो पवनकी । अपनी ओढेनी स्वर्णांबरकी । उतार कर रखी हो निजकी । अलग करके ॥ ८४ ॥ अथवा लहरसे वायुकी । मिटी हो अभी ज्योत दीपकी । चमक लहर बिजलीकी । अस्त हुई गगनमें ॥ ८५ ॥ अथवा हृदय-कमल पर्यंत । गया मानो प्रकाश-जलका झोत । अथवा स्वर्णधार आदिसे अंत । बहती हुई ॥ ८६ ॥ फिर वह हृदयाकाशमें । समायी हो एक रूपमे । जैसे शक्ति शक्तिके रूपमें । समायी जाती ॥ ८७ ॥ तभी वह शक्ति ही कहलाता । केवळ प्राण वायु जो रहता । नाद बिंदु अब नहीं जानता । कला औ" ज्योति ॥ ८८ ॥ करना मनका निरोध । तथा प्राणका अवरोध । ध्यानकी न रहती साध । तब अर्जुन ॥ ८९ ॥ कल्पनाका त्याग-भोग । न रहता अनुराग । महा-भूतोंका सुराग । रहता नहीं ॥ २९० ॥ पिंडसे करना पिंडका ग्रास । यह है नाथ-संकेत सारांश । कह गया यह महोपदेश । महाविष्णु ॥ ९१ ॥ रहस्यका बांध ढा कर । यथार्थका तह खोलकर । रखी सन्मुख मैंने सादर । ग्राहक श्रोतोंके ॥ ९२ ॥ युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियत मानसः । शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥ शक्तिका जब तेज लोपता । देहका तब रूप मिटता । फिर आंखोंमें ही छिप जाता । विश्वकी वह ॥ ९३ ॥ ऐसे मगन आत्मामें होता योगी मनो-जयी । मोक्षसे जो भिडी शांति पाता हो मुझमें रत ॥ १५ ॥ १७७ आत्म-संयमयोग (23)

वह पहिले जैसे रहता । अवयवोंसे भी पूर्ण होता । किंतु ऐसा हलका रहता । हवासे बना हो ॥ ९४ ॥ अथवा कर्दलीका है सार । खड़ा आप छाल खोलकर । या आकाश ही स-शरीर । खड़ा रहा हो ॥ ९५ ॥ ऐसा होता जब शरीर । कहलाता वह खेचर । पद मिलता चमत्कार । स-शरीर यह ॥ ९६ ॥ साधक करता जब यह स्थिति पार । तब होते जो उसके पदके आकार । उस पर सिद्धियां रमती हैं आकर । अणिमादिक ॥ ९७ ॥ किंतु क्या क्या करती हैं सिद्धियां । सुन तू यह बात धनंजय । लोप हो जाते भूत-चतुष्टय । देहके देहमें ॥ ९८ ॥ पृथ्विको आप गलाता । आपको तेज सुखाता । तेजको वायु सोखता । हृदयाकाशमें ॥ ९९ ॥ फिर आकाश अकेला रहता । किंतु शरीरका आकार लेता । वह भी अंतमें लय होता । मूर्ध्याकाशमें ॥ ३०० ॥ तब कुंडलिनी नाम मिटता । मारुता ऐसा नाम है मिलता । किंतु शक्तित्व बना ही रहता । शिवमें मिलने तक ॥ १ ॥ जालंधरको लांघकर । काकी मुखको तोड़कर । मूर्धन्यके पर्वतपर । चढ़ जाती है ॥ २ ॥ ॐकारकी पीठपर फिर । पद रख वह उठ कर । पश्यंति गिरा पीछे छोडकर । बढ जाती है ॥ ३ ॥ अर्ध तन्मात्रा फिर वेगमें । मूर्धन्याकाशके अंतरंगमें । मानो सरिता है सागरमें । मिल जाती है ॥ ४ ॥ ब्रह्मरंध्रमें फिर स्थिर होकर । सोऽहं भावके बाहें पसारकर । परमात्म-लिंगालिंगनमें सत्वर । दौड़ जाती है ॥ ५ ॥ पंच-महाभूतका परदा उठता । शिव-शक्तिका तब अद्वैत घडता । गगन सह सबका लय हो जाता । उस समरसैक्यमें ॥ ६ ॥ मेघ रूपसे हुआ जो द्वैत । धारा रूपसे आ मिला नित । जैसे आप ही मिलता नित । अपनेसे ही ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी १७८

वैसे तन रूपसे रहा द्वैत । त्यज शक्ति-शिव शिवमें रत । वह एकत्व अपनेमें नित । आप ही आप ॥ ८ ॥ रहा था क्या कभी द्वैत । या स्वयंसिद्ध अद्वैत । विचारमें भी यह बात । आती ही नहीं ॥ ९ ॥ लय हुआ गगनमें गगन । अनुभव करता है चिंतन । प्रत्यय जिसका उसे महान । बोध है यह ॥ ३१० ॥ इससे उस स्थितिका वर्णन । शब्दसे न हो सकता कथन । जब शब्दमें उलझता मन । होता है संवाद ॥ ११ ॥ करनेसे है सहज विचार । कथनका कहती अधिकार । रही भाषा वैखरी अति दूर । इस स्थितिसे ॥ १२ ॥ भ्रू-लताकी पिछली ओर । न धरता रूप मकार । प्रवेशमें कष्ट होते घोर । प्राणको भी ॥ १३ ॥ गगनमें होता प्राण प्रवेश । न रहता शब्दका अवशेष । उसमें भी लय होता आकाश । महाशून्यमें ॥ १४ ॥ कहां महासागर महाशून्यका । उसमें न लगे ठाव आकाशका । वहां कैसे शब्द-नांवके डांडका । लगे सुराग ॥ १५ ॥ तब यह कहना शब्दसे । तथा सुनना भी जो कानसे । असंभव है जान. तू इसे । पांडुकुमार ॥ १६ ॥ जब कभी दैवयोगसे । सानुभव पाना है इसे । आपमें समरसैक्यसे । आप हो रहना ॥ १७ ॥ हुआ है जो उसमें ही एक । कहना क्या उसका अधिक । कहना वही एक ही एक । व्यर्थका ही ॥ १८ ॥ शब्दमात्र है पीछे हठता । संकल्पका नाम न रहता । वायु भी नहीं भी तर आता । विचारका वहां ॥ १९ ॥ वह है उन्मनीका लावण्य । तथा है तुर्याका सु-तारुण्य । अनादि और जो है अगण्य । परम-तत्व ॥ ३२० ॥ आकारका जो प्रांत । मोक्षका जो एकांत । जहां आदि औ' अंत । हुए विलीन ॥ २१ ॥ १७९ आत्म-संयमयोग

विश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल । आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥ महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज । एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥ यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार । नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥ वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष । टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥ हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान । हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥ अर्जुनका संदेह— पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे । दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥ अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास । अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान । इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥ होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित । कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥ सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त । अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥ इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं । थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥ अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने । योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥ योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज । तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १८०

अध्याय ५: संन्यासयोग

नही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे । बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥ अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण । देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥ अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना । चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥ या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं । ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥ श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण । वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥ योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती । योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥ वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा । योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥ किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत । ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥ श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण- इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ । ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥ फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था । अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके । वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥ १८१ आत्म-संयमयोग

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ रसनेन्द्रियका जो अंकित होता । निद्राको जो अपने प्राण बेचता । योगमें वह नहीं है कहलाता । अधिकारी कभी ॥ ४५ ॥ या आग्रह वश होकर । भूख-प्यासको रोककर । या आहारको तोड़कर । करता दमन ॥ ४६ ॥ तथा निद्रासे विमुख होकर । दुराग्रहसे उन्मत्त होकर । शरीरका अधिकार खोकर । योग हो कैसे ॥ ४७ ॥ विषय सेवनकी तीव्र आस । विरोधका यह भाव है खास । तथा पूर्ण विरोध स आबेश । यह भी न करना ॥ ४८ ॥ अन्नका सेवन करना । हित मित युक्त ही खाना । क्रियाचरण करना । नियमित ॥ ४९ ॥ संयत वचन बोलना । नियमित डग भरना । निद्राका सन्मान करना । यथोचित ॥ ५० ॥ करना है यदि जागरण । उसका भी होना परिमाण । जिससे हो धातु नियमन । अनायास ॥ ५१ ॥ देना ऐसे युक्तियुक्त । इंद्रियोंको जो वांछित । रहता इससे चित्त । सदा संतुष्ट ॥ ५२ ॥ यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥ खाना औ' जगना सोना फिरना अन्य कार्य भी । इसे जो करता योग्य योग है दुःख नाशक ॥ १७ ॥ आत्मामें लीन होता है पूर्ण संयत चित्त जो । होती है वासना शांत योगी तोयुक्त जान तू ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १८२

बाहर जब युक्ति सधती । अंतरमें सुख-वृद्धि होती । ऐसी योग-सिद्धि बढ़ती । अनायास ॥ ५३ ॥ जैसा भाग्यका उदय होता । उद्यमका निमित्त मिलता । ऐश्वर्य सर्वस्व घर आता । अपने आप ॥ ५४ ॥ युक्तियुक्त सदा लिलासे । अभ्यासकी चालढालसे । खिलता है आत्म-सिद्धिसे । उसका अनुभव ॥ ५५ ॥ रहता है जो युक्तियुक्त । होता है सदा भाग्यवंत । जिससे होता अलंकृत । मुक्त भावसे ॥ ५६ ॥ यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥ होता जहां युक्ति-योगका मिलन । वहां है प्रयागका संगमस्थान । क्षेत्र संन्यास लेकरके मन । बसता है यहां ॥ ५७ ॥ उसको योग-युक्त करना । प्रसंगसे यह भी जानना । दीप-ज्योतिकी यह तुलना । निर्वात-स्थलकी ॥ ५८ ॥ इस अभ्याससे मन निश्चल बनता है— अब तेरा मन जान कर । कहते हम पांडुकुमार । सुन तू वह चित्त देकर । बात जो भली ॥ ५९ ॥ जब तू उसे पाना चाहता । किंतु अभ्यासमें दक्ष न होता । तब कठिनाईसे क्यों डरता । इसकी भला ॥ ३६० ॥ अर्जुन यहां कष्ट नहीं जान । करता यह ग्रह यदि मन । हौवा बनाती इंद्रियां दुर्जन । व्यर्थ ही इसका ॥ ६१ ॥ आयूको जो स्थिर करती । जीवनको भी लौटा लाती । उसे नहीं क्या शत्रु मानती । रसनेंद्रिय ॥ ६२ ॥ निर्वात स्थलमें जैसे जलता दीप निश्चल । आत्मान्वेषक योगीके चित्तकी उपमा कही ॥ १९ ॥ १८४ आत्म-संयमयोग

ऐसा जो कुछ भी है हितका । रहा है इंद्रियोंके दुखका । ऐसे नहीं योगके सरीखा । सरल कछु ॥ ६३ ॥ यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवाऽऽत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ तभी आसनकी दृढ़तासे । कहा सभी अभ्यास तुझसे । हुआ तो हो निरोध इससे । इंद्रियोंका ॥ ६४ ॥ अन्यथा जब इस योगसे । इंद्रियोंका निग्रह होनेसे । निकलता चित्त अपनेसे । मिलन हेतु ॥ ६५ ॥ जब वह विषयोंसे निवृत्त होता । अपनेमें अपनेको ही है देखता । पहचान करके तब है कहता । सोऽहम् ब्रह्म ॥ ६६ ॥ इसी पहचानमें । सुखके साम्राज्यमें । चित्त समरसमें । विलीन होता ॥ ६७ ॥ इससे भिन्न कुछ भी नहीं । इसे इंद्रियां जानती नहीं । वह अपनेमें आप वही । बन जाता मन ॥ ६८ ॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥ अवरुद्ध चित्तका है संचार मिटता सब । आत्मासे मिलके आत्मा तोषता निजमें स्वयं ॥ २० ॥ भोगके इंद्रियातीत बुद्धि-गम्य महा-सुख । डिगे नहीं जहां जाके तत्वज्ञ लेश-मात्र भी ॥ २१ ॥ न माने अन्य जो लाभ श्रेष्ठ है इस लाभसे । दुःखके भारसे भारी न कांपे रहके वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १८४

इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता -- फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत । पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥ या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन । चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥ अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त । सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥ तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन । संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥ वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य । ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत । देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥ संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥ जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है— किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान । संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥ उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है । दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥ संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे । मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥ १८५ (24) आत्म-संयमयोग

सुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित । शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥ यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया । धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥ शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥ यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥ जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन । कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥ होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति । यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥ करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत । तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥ इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ । नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥ फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा । इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥ प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥ होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक । आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥ फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर । वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥ प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा । विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी १८६

फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे । पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥ उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत । होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥ दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन । तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥ जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता । ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग-- ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका । संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥ सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे । होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥ मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें । दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥ यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे । यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर । सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥ भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे । देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥ १८७ आत्म-संयमयोग

मैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें । विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥ यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ । किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना । सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥ जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण । सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥ वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन । न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥ जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस । उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥ जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन । मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें । जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥ सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब । वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥ भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें । कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी १८८

जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार । ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥ अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल । अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥ यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता । अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥ मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान । कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥ यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है । उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान । स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥ सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म । ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥ ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व । मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥ कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण । मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥ अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन । किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥ अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना । कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो । सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥ १८९ आत्म-संयमयोग

इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत । साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥ अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय-- कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण । किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥ यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान । किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥ तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा । अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥ अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता । धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥ विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता । आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥ पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता । अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥ अर्जुनने कहा अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन । दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३ मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो । दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १९०

ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा । ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥ भगवान उवाच संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है— कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित । इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥ किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर । परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥ मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक । दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं । उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥ राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी । विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥ मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं । तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥ श्री भगवानने कहा अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह । जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥ बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं । होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥ १९१ आत्म-संयमयोग

मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा । तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥ तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान । किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥ अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल । यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥ अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत । योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥ किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा । तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥ अर्जुनने कहा श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो । कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥ होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको । नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥ मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर । तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी १९२