ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल । आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥ महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज । एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥ यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार । नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥ वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष । टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥ हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान । हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥ अर्जुनका संदेह— पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे । दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥ अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास । अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान । इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥ होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित । कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥ सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त । अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥ इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं । थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥ अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने । योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥ योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज । तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १८०