भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे तन रूपसे रहा द्वैत । त्यज शक्ति-शिव शिवमें रत । वह एकत्व अपनेमें नित । आप ही आप ॥ ८ ॥ रहा था क्या कभी द्वैत । या स्वयंसिद्ध अद्वैत । विचारमें भी यह बात । आती ही नहीं ॥ ९ ॥ लय हुआ गगनमें गगन । अनुभव करता है चिंतन । प्रत्यय जिसका उसे महान । बोध है यह ॥ ३१० ॥ इससे उस स्थितिका वर्णन । शब्दसे न हो सकता कथन । जब शब्दमें उलझता मन । होता है संवाद ॥ ११ ॥ करनेसे है सहज विचार । कथनका कहती अधिकार । रही भाषा वैखरी अति दूर । इस स्थितिसे ॥ १२ ॥ भ्रू-लताकी पिछली ओर । न धरता रूप मकार । प्रवेशमें कष्ट होते घोर । प्राणको भी ॥ १३ ॥ गगनमें होता प्राण प्रवेश । न रहता शब्दका अवशेष । उसमें भी लय होता आकाश । महाशून्यमें ॥ १४ ॥ कहां महासागर महाशून्यका । उसमें न लगे ठाव आकाशका । वहां कैसे शब्द-नांवके डांडका । लगे सुराग ॥ १५ ॥ तब यह कहना शब्दसे । तथा सुनना भी जो कानसे । असंभव है जान. तू इसे । पांडुकुमार ॥ १६ ॥ जब कभी दैवयोगसे । सानुभव पाना है इसे । आपमें समरसैक्यसे । आप हो रहना ॥ १७ ॥ हुआ है जो उसमें ही एक । कहना क्या उसका अधिक । कहना वही एक ही एक । व्यर्थका ही ॥ १८ ॥ शब्दमात्र है पीछे हठता । संकल्पका नाम न रहता । वायु भी नहीं भी तर आता । विचारका वहां ॥ १९ ॥ वह है उन्मनीका लावण्य । तथा है तुर्याका सु-तारुण्य । अनादि और जो है अगण्य । परम-तत्व ॥ ३२० ॥ आकारका जो प्रांत । मोक्षका जो एकांत । जहां आदि औ' अंत । हुए विलीन ॥ २१ ॥ १७९ आत्म-संयमयोग

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