ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंनही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे । बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥ अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण । देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥ अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना । चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥ या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं । ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥ श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण । वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥ योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती । योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥ वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा । योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥ किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत । ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥ श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण- इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ । ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥ फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था । अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके । वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥ १८१ आत्म-संयमयोग