भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ रसनेन्द्रियका जो अंकित होता । निद्राको जो अपने प्राण बेचता । योगमें वह नहीं है कहलाता । अधिकारी कभी ॥ ४५ ॥ या आग्रह वश होकर । भूख-प्यासको रोककर । या आहारको तोड़कर । करता दमन ॥ ४६ ॥ तथा निद्रासे विमुख होकर । दुराग्रहसे उन्मत्त होकर । शरीरका अधिकार खोकर । योग हो कैसे ॥ ४७ ॥ विषय सेवनकी तीव्र आस । विरोधका यह भाव है खास । तथा पूर्ण विरोध स आबेश । यह भी न करना ॥ ४८ ॥ अन्नका सेवन करना । हित मित युक्त ही खाना । क्रियाचरण करना । नियमित ॥ ४९ ॥ संयत वचन बोलना । नियमित डग भरना । निद्राका सन्मान करना । यथोचित ॥ ५० ॥ करना है यदि जागरण । उसका भी होना परिमाण । जिससे हो धातु नियमन । अनायास ॥ ५१ ॥ देना ऐसे युक्तियुक्त । इंद्रियोंको जो वांछित । रहता इससे चित्त । सदा संतुष्ट ॥ ५२ ॥ यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥ खाना औ' जगना सोना फिरना अन्य कार्य भी । इसे जो करता योग्य योग है दुःख नाशक ॥ १७ ॥ आत्मामें लीन होता है पूर्ण संयत चित्त जो । होती है वासना शांत योगी तोयुक्त जान तू ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १८२