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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

विश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल । आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥ महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज । एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥ यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार । नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥ वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष । टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥ हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान । हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥ अर्जुनका संदेह— पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे । दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥ अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास । अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान । इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥ होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित । कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥ सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त । अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥ इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं । थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥ अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने । योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥ योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज । तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १८०

अध्याय ५: संन्यासयोग

नही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे । बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥ अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण । देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥ अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना । चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥ या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं । ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥ श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण । वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥ योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती । योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥ वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा । योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥ किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत । ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥ श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण- इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ । ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥ फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था । अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके । वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥ १८१ आत्म-संयमयोग

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ रसनेन्द्रियका जो अंकित होता । निद्राको जो अपने प्राण बेचता । योगमें वह नहीं है कहलाता । अधिकारी कभी ॥ ४५ ॥ या आग्रह वश होकर । भूख-प्यासको रोककर । या आहारको तोड़कर । करता दमन ॥ ४६ ॥ तथा निद्रासे विमुख होकर । दुराग्रहसे उन्मत्त होकर । शरीरका अधिकार खोकर । योग हो कैसे ॥ ४७ ॥ विषय सेवनकी तीव्र आस । विरोधका यह भाव है खास । तथा पूर्ण विरोध स आबेश । यह भी न करना ॥ ४८ ॥ अन्नका सेवन करना । हित मित युक्त ही खाना । क्रियाचरण करना । नियमित ॥ ४९ ॥ संयत वचन बोलना । नियमित डग भरना । निद्राका सन्मान करना । यथोचित ॥ ५० ॥ करना है यदि जागरण । उसका भी होना परिमाण । जिससे हो धातु नियमन । अनायास ॥ ५१ ॥ देना ऐसे युक्तियुक्त । इंद्रियोंको जो वांछित । रहता इससे चित्त । सदा संतुष्ट ॥ ५२ ॥ यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥ खाना औ' जगना सोना फिरना अन्य कार्य भी । इसे जो करता योग्य योग है दुःख नाशक ॥ १७ ॥ आत्मामें लीन होता है पूर्ण संयत चित्त जो । होती है वासना शांत योगी तोयुक्त जान तू ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी १८२

बाहर जब युक्ति सधती । अंतरमें सुख-वृद्धि होती । ऐसी योग-सिद्धि बढ़ती । अनायास ॥ ५३ ॥ जैसा भाग्यका उदय होता । उद्यमका निमित्त मिलता । ऐश्वर्य सर्वस्व घर आता । अपने आप ॥ ५४ ॥ युक्तियुक्त सदा लिलासे । अभ्यासकी चालढालसे । खिलता है आत्म-सिद्धिसे । उसका अनुभव ॥ ५५ ॥ रहता है जो युक्तियुक्त । होता है सदा भाग्यवंत । जिससे होता अलंकृत । मुक्त भावसे ॥ ५६ ॥ यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥ होता जहां युक्ति-योगका मिलन । वहां है प्रयागका संगमस्थान । क्षेत्र संन्यास लेकरके मन । बसता है यहां ॥ ५७ ॥ उसको योग-युक्त करना । प्रसंगसे यह भी जानना । दीप-ज्योतिकी यह तुलना । निर्वात-स्थलकी ॥ ५८ ॥ इस अभ्याससे मन निश्चल बनता है— अब तेरा मन जान कर । कहते हम पांडुकुमार । सुन तू वह चित्त देकर । बात जो भली ॥ ५९ ॥ जब तू उसे पाना चाहता । किंतु अभ्यासमें दक्ष न होता । तब कठिनाईसे क्यों डरता । इसकी भला ॥ ३६० ॥ अर्जुन यहां कष्ट नहीं जान । करता यह ग्रह यदि मन । हौवा बनाती इंद्रियां दुर्जन । व्यर्थ ही इसका ॥ ६१ ॥ आयूको जो स्थिर करती । जीवनको भी लौटा लाती । उसे नहीं क्या शत्रु मानती । रसनेंद्रिय ॥ ६२ ॥ निर्वात स्थलमें जैसे जलता दीप निश्चल । आत्मान्वेषक योगीके चित्तकी उपमा कही ॥ १९ ॥ १८४ आत्म-संयमयोग

ऐसा जो कुछ भी है हितका । रहा है इंद्रियोंके दुखका । ऐसे नहीं योगके सरीखा । सरल कछु ॥ ६३ ॥ यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवाऽऽत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ तभी आसनकी दृढ़तासे । कहा सभी अभ्यास तुझसे । हुआ तो हो निरोध इससे । इंद्रियोंका ॥ ६४ ॥ अन्यथा जब इस योगसे । इंद्रियोंका निग्रह होनेसे । निकलता चित्त अपनेसे । मिलन हेतु ॥ ६५ ॥ जब वह विषयोंसे निवृत्त होता । अपनेमें अपनेको ही है देखता । पहचान करके तब है कहता । सोऽहम् ब्रह्म ॥ ६६ ॥ इसी पहचानमें । सुखके साम्राज्यमें । चित्त समरसमें । विलीन होता ॥ ६७ ॥ इससे भिन्न कुछ भी नहीं । इसे इंद्रियां जानती नहीं । वह अपनेमें आप वही । बन जाता मन ॥ ६८ ॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥ अवरुद्ध चित्तका है संचार मिटता सब । आत्मासे मिलके आत्मा तोषता निजमें स्वयं ॥ २० ॥ भोगके इंद्रियातीत बुद्धि-गम्य महा-सुख । डिगे नहीं जहां जाके तत्वज्ञ लेश-मात्र भी ॥ २१ ॥ न माने अन्य जो लाभ श्रेष्ठ है इस लाभसे । दुःखके भारसे भारी न कांपे रहके वहां ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी १८४

इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता -- फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत । पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥ या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन । चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥ अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त । सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥ तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन । संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥ वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य । ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत । देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥ संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥ जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है— किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान । संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥ उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है । दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥ संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे । मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥ १८५ (24) आत्म-संयमयोग

सुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित । शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥ यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया । धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥ शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥ यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥ जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन । कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥ होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति । यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥ करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत । तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥ इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ । नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥ फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा । इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥ प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥ होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक । आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥ फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर । वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥ प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा । विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी १८६

फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे । पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥ उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत । होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥ दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन । तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥ जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता । ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग-- ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका । संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥ सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे । होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥ मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें । दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥ यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे । यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर । सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥ भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे । देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥ १८७ आत्म-संयमयोग

मैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें । विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥ यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ । किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना । सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥ जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण । सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥ वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन । न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥ जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस । उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥ जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन । मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें । जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥ सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब । वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥ भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें । कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी १८८

जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार । ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥ अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल । अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥ यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता । अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥ मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान । कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥ यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है । उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान । स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥ सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म । ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥ ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व । मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥ कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण । मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥ अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन । किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥ अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना । कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो । सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥ १८९ आत्म-संयमयोग

इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत । साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥ अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय-- कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण । किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥ यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान । किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥ तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा । अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥ अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता । धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥ विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता । आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥ पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता । अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥ अर्जुनने कहा अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन । दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३ मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो । दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १९०

ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा । ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥ भगवान उवाच संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है— कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित । इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥ किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर । परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥ मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक । दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं । उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥ राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी । विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥ मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं । तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥ श्री भगवानने कहा अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह । जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥ बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं । होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥ १९१ आत्म-संयमयोग

मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा । तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥ तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान । किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥ अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल । यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥ अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत । योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥ किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा । तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥ अर्जुनने कहा श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो । कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥ होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको । नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥ मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर । तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी १९२

जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम । सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥ साधना अधूरी रही तो ?— किंतु देव और एक । मनमें है अकथक । तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥ कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद । चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥ निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे । आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥ किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको । गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥ अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल । शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥ ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे । पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥ गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे । उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥ भगवान उवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती— कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था । उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥ श्री भगवानने कहा न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें । कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥ १९३ आत्म-संयमयोग (25)

किंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता । इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥ अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता । सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥ किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना । फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख । पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥ वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग । उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥ विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक । स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥ फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता । सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥ नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते । देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥ वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां । सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥ जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता । जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥ निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता । ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥ रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत । शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी १९४

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥ या हैं जो ज्ञानग्निमें करते हवन । या ब्रह्मनिष्ठ वेदशास्त्रादि संपन्न । अथवा ब्रह्मसुखानुभूत महान । होते हैं पार्थ ॥ ४९ ॥ या सिद्धांत सिंहासनपे बैठकर । राज्य करते हैं त्रिभुवन पर । संतोष वनमें कोयल बनकर । कूकते रहते ॥ ४५० ॥ या विवेक ग्रामके हृदयमें । बैठ निरत हैं फलाहारमें । ऐसे महायोगियोंके घरमें । पाते हैं जन्म ॥ ५१ ॥ छोटीसी देहाकृतिमें ही उदित । निज ज्ञानका प्रातःकाल निश्चित । जैसे सूर्योदयके पूर्व होता नित । अरुणोदय वैसा ॥ ५२ ॥ वैसे अवस्थाकी राह न देखती । वयका गांव भी नहीं पूछती । बालपनमें ही है ब्याह लेती । सर्वज्ञता उसे ॥ ५३ ॥ सिद्ध प्रज्ञाके उसी लाभसे । सारस्वत प्रसवता है मनसे । फिर सकल शास्त्र हैं मुखसे । निकलते सहज ॥ ५४ ॥ ऐसा है वह दिव्य जन्म । जिसकेलिये हो सकाम । करते देव स्वर्गमें होम । सदा सर्वत्र ॥ ५५ ॥ अमरोंको है भाट बनना । मृत्यु-लोकके गुण हैं गाना । ऐसा है वह जन्म अर्जुन । पाता है जो ॥ ५६ ॥ अथवा प्राज्ञ योगीके कुलमें जन्मता वह । बडा दुर्लभ है ऐसा जन्म पाना जगतमें ॥ ४२ ॥ वहां जो पूर्व-जन्मके बुद्धि संस्कार पाकर । मोक्षार्थ करता यत्न पानेमें सिद्धि उत्तम ॥ ४३ ॥ १९५ आत्म-संयमयोग

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि। फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥ पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे। देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥ वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत। करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥ इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन। मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥ होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे। पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥ मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव। अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥ जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप। जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥ संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा। होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥ समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका। लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥ पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर। योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥ यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर। अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी १९६

तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण । जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥ फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी । बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥ मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता । आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥ होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न । जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥ ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति । ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥ अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके । इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥ किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न । अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥ जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन । प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥ जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा । कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥ अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये । जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥ अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार । भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥ ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है । माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥ १९७ आत्म-दर्शनयोग

था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय । और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥ वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण । जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥ तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य । है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥ जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म । होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥ तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे । योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता । मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥ जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण । हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥ फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका । अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥ वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा । मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥ ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र । बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥ जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ । जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥ श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके । भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी १९८

जान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण । करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥ ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा । अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥ सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल । सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥ फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर । निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥ चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे । बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥ सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा । रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥ किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना । चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥ यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर । सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥ स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे । तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥ अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे । वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-