भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम । सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥ साधना अधूरी रही तो ?— किंतु देव और एक । मनमें है अकथक । तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥ कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद । चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥ निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे । आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥ किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको । गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥ अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल । शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥ ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे । पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥ गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे । उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥ भगवान उवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती— कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था । उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥ श्री भगवानने कहा न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें । कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥ १९३ आत्म-संयमयोग (25)

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