ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता । इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥ अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता । सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥ किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना । फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख । पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥ वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग । उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥ विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक । स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥ फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता । सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥ नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते । देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥ वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां । सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥ जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता । जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥ निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता । ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥ रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत । शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी १९४