भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा । तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥ तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान । किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥ अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल । यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥ अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत । योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥ किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा । तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥ अर्जुनने कहा श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो । कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥ होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको । नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥ मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर । तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी १९२