भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा । ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥ भगवान उवाच संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है— कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित । इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥ किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर । परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥ मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक । दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं । उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥ राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी । विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥ मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं । तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥ श्री भगवानने कहा अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह । जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥ बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं । होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥ १९१ आत्म-संयमयोग