भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण । जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥ फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी । बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥ मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता । आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥ होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न । जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥ ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति । ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥ अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके । इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥ किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न । अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥ जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन । प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥ जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा । कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥ अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये । जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥ अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार । भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥ ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है । माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥ १९७ आत्म-दर्शनयोग