ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि। फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥ पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे। देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥ वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत। करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥ इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन। मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥ होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे। पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥ मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव। अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥ जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप। जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥ संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा। होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥ समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका। लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥ पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर। योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥ यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर। अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी १९६