भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय । और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥ वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण । जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥ तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य । है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥ जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म । होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥ तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे । योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता । मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥ जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण । हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥ फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका । अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥ वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा । मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥ ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र । बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥ जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ । जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥ श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके । भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी १९८