ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण । करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥ ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा । अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥ सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल । सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥ फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर । निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥ चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे । बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥ सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा । रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥ किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना । चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥ यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर । सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥ स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे । तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥ अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे । वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-