भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 270

७ ज्ञानविज्ञानयोग भगवान उवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान - सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत । हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥ जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे । अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥ यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना । किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥ क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके । जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥ श्री भगवानने कहा .चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते । कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥ ˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे । जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥