भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी । भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥ नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान । वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥ अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका । तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥ रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ । जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥ जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन । मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥ मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है— सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक । चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥ जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन । करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥ उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक । पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥ आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें । पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥ इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य । फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥ शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी । जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥ (26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग