ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ अब तू सुन हे धनंजय । है महदादिक मेरी माया । जैसे प्रतिबिंबित हो छाया । निजांगोंकी ॥ १५ ॥ यह विज्ञान है— इसे कहते प्रकृति जान । जान यह जो अष्टधा भिन्न । उत्पन्न होता है त्रिभुवन । इससे ही ॥ १६ ॥ यह है कैसी अष्टधा भिन्न । पूछता है यदि यह मन । कहता हूं अब विवेचन । सुन तू यह ॥ १७ ॥ आप तेज तथा गगन । धरणी मारुत औ' मन । बुद्धि अहंकार है भिन्न । ये भाग आठ ॥ १८ ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ औ' इन आठोंकी जो समावस्था । मेरी परमप्रकृति है पार्थ । उसका नाम है सुन व्यवस्था । जीव ऐसा ॥ १९ ॥ जड़को जो है जिलाता । चेतनको है चेताता । मनसे है मनवाता । शोक मोहादिक ॥ २० ॥ बुद्धिमें जो शक्ति है जानना । उसके सान्निध्यके कारण । अहंकार कौशल्यके कारण । उसने धरा जगत ॥ २१ ॥ पृथ्वी आप तथा तेज वायु आकाश पांचवा । मन बुद्धि अहंकार मेरी प्रकृति है यह ॥ ४ ॥ हुई ये अपरा मेरी दूसरी जान तू परा । जीव रूप बनके जो धरता विश्वको सब ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी २०२