ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे । निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥ उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज । उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥ होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार । भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥ पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे । उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥ नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती । कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥ जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल । नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥ तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात । तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल । रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥ इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि । उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥ इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू । उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥ नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे । पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥ २०३ ज्ञान-विज्ञानयोग