ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार । जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥ जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये । वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥ रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श । तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥ वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध । तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥ नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व । वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥ अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है । उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥ तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें । आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥ एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता । कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥ सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन । उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥ हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें । वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥ मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना । .आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २०४