ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा । अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥ अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता । महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥ ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज । हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥ इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार । इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥ जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप । जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥ बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल । बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥ भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म । मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥ अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें । किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥ शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ । तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥
बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन । तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥ वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका । धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥ २०५ ज्ञान-विज्ञानयोग