भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता । संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥ तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर । सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥ ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित । वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥ कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न । जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व । वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥ हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं । स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥ नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस । फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥ फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी । वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥ अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल । अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥ फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे । किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥ जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता । वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥ मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस । इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २०६