ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है— जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे । झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥ अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब । आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥ अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका । देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥ ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया । उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥ प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते । जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥ माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका । किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥ वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव । किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥ तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं । अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥ दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—
इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित । जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥ दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर । मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥ २०७ ज्ञान-विज्ञानयोग