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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार । जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥ जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये । वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥ रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श । तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥ वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध । तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥ नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व । वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥ अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है । उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥ तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें । आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥ एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता । कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥ सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन । उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥ हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें । वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥ मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना । .आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २०४

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा । अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥ अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता । महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥ ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज । हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥ इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार । इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥ जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप । जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥ बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल । बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥ भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म । मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥ अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें । किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥ शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ । तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥

बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन । तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥ वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका । धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥ २०५ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता । संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥ तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर । सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥ ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित । वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥ कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न । जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व । वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥ हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं । स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥ नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस । फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥ फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी । वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥ अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल । अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥ फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे । किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥ जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता । वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥ मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस । इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २०६

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है— जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे । झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥ अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब । आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥ अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका । देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥ ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया । उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥ प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते । जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥ माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका । किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥ वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव । किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥ तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं । अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥ दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—

इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित । जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥ दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर । मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥ २०७ ज्ञान-विज्ञानयोग

महदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय । होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥ टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके । उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥ सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे । प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥ जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे । काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥ भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे । तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥ चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके । ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥ वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके । दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥ अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके । उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥ जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके । बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥ संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके । वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥ जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें । रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥ वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर । यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥ पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग । ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥ महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर । करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी २०८

यहां है एक और आश्चर्य । करते हैं जो तरणोपाय । होता है वह सब अपाय । वह कैसा जान ॥ ८२ ॥ बुद्धि बाहूसे जो तरने गये । पता नहीं चला वे कहां गये । अभिमान डोहमें डूब गये । ज्ञानमानी जो ॥ ८३ ॥ लिया जिन्होंने वेदोंका आश्रय । साथ ही दिया मानको प्रश्रय । हुए वे मद-मीनमें ही लय । पूर्ण रूपसे ॥ ८४ ॥ जिसने किया तारुण्यका साथ । उसपे पड़ा मन्मथका हाथ । उसे विषय मगरके दांत । चबाते सदा ॥ ८५ ॥ फिर वृद्धावस्थाका जाल । मति-भ्रम कंप जंजाल । कसता जाता पल पल । चहूं ओरसे ॥ ८६ ॥ पटकता फिर शोक तीर पर । क्रोधावर्तमें नित उलझाकर । जब उठाते हैं उसमेंसे सिर । कोंचते विपद्गृध्र ॥ ८७ ॥ रुते फिर दुःख पंकमें । फंसे नित मृत्यु-पाशमें । गये जो काम आश्रयमें । गये व्यर्थ ही जो ॥ ८८ ॥ यज्ञ-क्रियाके साधनसे । लैस होकर तरनेसे । स्वर्ग-कंदरामें जा फंसे । यकायक ॥ ८९ ॥ मुक्ति-किनारा जो पाने गये । कर्म-बाहूंका आसरा लिये । चक्करमें ही उलझ गये । विधि-निषेधके ॥ ९० ॥ वहां वैराग्य नांव नहीं जाती । विवेकको थाह नहीं मिलती । योग-विद्या भी यदि काम आती । यदाकदा ही ॥ ९१ ॥ अपना बल लगाकर । माया-नदीको तैर कर । पार करनेका विचार । व्यर्थ ही है ॥ ९२ ॥ कुपथ्यशीलकी मिटे व्याधी । साधु जाने दुर्जनकी बुद्धि । अथवा लोभी त्यजे श्रीसिद्धि । हाथमें जो आयी ॥ ९३ ॥ अथवा दंड डरे चोरसे । कांटा निगला जावे मीनसे । तथा काय लडे भूतसे । वैसे ही पार्थ ॥ ९४ ॥ या जाल कुतरे मृग-छौना । चींटीका हिमगिरि लांगना । तभी है माया नदी तैरना । जीवसे साध्य ॥ ९५ ॥ २०९ ज्ञान-विज्ञानयोग (27)

अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता । वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥ किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे । सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥ सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ । आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥ अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर । अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥ फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार । तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥ उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर । फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥ इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये । ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं— अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार । होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥ हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के । भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥ भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित । ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी २१०

होता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान । किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥ क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य । तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥ इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर । विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥ दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे । बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥ इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे । उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥ चार प्रकारके मेरे भक्त --- पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता । तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ । तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥ मत्प्रिय ज्ञानी भक्त— अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं । वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥ होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे । रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥ श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो । उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥ २११ ज्ञान-विज्ञानयोग

जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक । वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥ पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता । ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥ हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न । वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥ ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे । आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥ किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे । मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥ जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार । पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥ ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे । किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥ अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा । किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥ क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे । जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥ इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति । इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥ रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले । वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥ हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है । मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी २१२

किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार । सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥ जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम । कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥ अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है । यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव— वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके । पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥ फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर । निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥ शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता । फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥ शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे । दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥ फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी । वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥ जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं । सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥ उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं । तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥ होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर । इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥ अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति । विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥ २१३ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर । देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥ यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव । इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥ उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर । ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक— ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन । आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥ कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥ होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश । बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥ पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर । होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥ पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके । लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥ क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि । अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत । स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥ पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको । जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी २१४

किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता । इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥ देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता । सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित । सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥ जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव । मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥ अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन । यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥ फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत । होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥ यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण । होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥ उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको । मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥ नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके । देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥ २१५ ज्ञान-विज्ञानयोग

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित । मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥ या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर । स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥ किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना । सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥ फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर । क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥ चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार । उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥ असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन । स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥ किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन । न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥ मैं सर्वव्यापी हूं किंतु -- क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे । न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥ पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके । अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥ घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे । अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २१६

ऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं । जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥ पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता । वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥ वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत । आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥ भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं । यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥ अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे । भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥ सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित । संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥ कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन । अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥ जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका । हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥ आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके । बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥ हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां । सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥ राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो । जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥ २१७ ज्ञान-विज्ञानयोग (28)

धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता । नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥ असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर । विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥ जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार । खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥ इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये । फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥ भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर । नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥ थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता-- पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके । रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥ सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी । महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥ सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा । इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥ गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे । दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥ जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको । जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१८

उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल । पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥ कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता । तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥ उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ । उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥ साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके । वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको । जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥ अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे । वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥ अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता । सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥ किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा । अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥ अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण । औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥ सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका— तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल । पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥ अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें । प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥ २१९ ज्ञान-विज्ञानयोग

जहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल । साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥ जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल । लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥ जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये । फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥ उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे । चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥ लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके । व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥ फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन । रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥ उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल । प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥ किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता । इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥ कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित । ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥ नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद । थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥ मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी । पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥ विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन । ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥ श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल । करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥ ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय । है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी २२०

कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे । मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥ चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना । कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥ पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन । स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥ देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन । करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥ कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान । जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥ अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना । संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥ सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन । कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥ बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार । अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥ जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल । लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥ वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य । फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥ जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन । यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥ गीता श्लोक ३० ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.

८ सातत्ययोग अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अर्जुनके सात प्रश्न -- फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने । अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥ कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म । अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥ प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे । यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है । समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥ अर्जुनने कहा किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या । अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥ अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें । कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥

तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान । वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु— कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके । बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥ अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ । “तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥ शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका । होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥ क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार । जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥ जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण । तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥ किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम । तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥ इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ । भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥ आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता । नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥ कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां । जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥ भगवान उवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ श्री भगवानने कहा ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो । भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥ २२३ सातत्ययोग