ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल । साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥ जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल । लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥ जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये । फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥ उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे । चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥ लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके । व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥ फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन । रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥ उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल । प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥ किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता । इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥ कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित । ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥ नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद । थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥ मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी । पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥ विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन । ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥ श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल । करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥ ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय । है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी २२०