ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल । साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥ जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल । लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥ जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये । फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥ उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे । चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥ लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके । व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥ फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन । रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥ उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल । प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥ किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता । इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥ कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित । ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥ नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद । थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥ मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी । पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥ विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन । ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥ श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल । करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥ ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय । है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी २२०
कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे । मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥ चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना । कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥ पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन । स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥ देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन । करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥ कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान । जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥ अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना । संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥ सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन । कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥ बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार । अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥ जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल । लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥ वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य । फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥ जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन । यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥ गीता श्लोक ३० ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.
८ सातत्ययोग अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अर्जुनके सात प्रश्न -- फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने । अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥ कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म । अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥ प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे । यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है । समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥ अर्जुनने कहा किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या । अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥ अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें । कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥
तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान । वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु— कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके । बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥ अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ । “तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥ शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका । होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥ क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार । जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥ जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण । तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥ किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम । तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥ इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ । भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥ आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता । नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥ कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां । जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥ भगवान उवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ श्री भगवानने कहा ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो । भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥ २२३ सातत्ययोग
सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म -- कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार । उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥ देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता । गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥ इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर । चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥ सहज नित्यत्व है आध्यात्म तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात । आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥ जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व । यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥ बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है--- जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल । उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥ उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे । ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥ निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर । फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥ देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर । होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥ फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस । जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥ पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण । यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २२४
न जाने सब विषम आये कैसे । व्यर्थ ही चराचर रचते ऐसे । औ' प्रसव योनिके अनंत जैसे । दीखते प्रकार ॥ २६ ॥ यहां है जीव-भावके कोंपल । गगनातीत दीखते सकल । देखें तो इनके जन्मका मूल । वहां है शून्य ॥ २७ ॥ मूलमें कर्ता कोई दीखता नहीं । तथा कारण कुछ नहीं कहीं । किंतु कार्य आप रुकता ही नहीं । बढ़ता जाता ॥ २८ ॥ ऐसे कर्ताके बिन गोचर । अव्यक्तमें जो यह आकार । निपजता है यह व्यापार । उसका नाम कर्म ॥ २९ ॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ बादलके समान जो बनता और बिगडता है वह अधिभूत — अब जो अधिभूत कहलाता । वह भी संक्षेपमें हूं कहता । जो है बनता और बिगड़ता । बादल जैसा ॥ ३० ॥ ऐसा व्यर्थ है अस्तित्व जिसका । न होता सहज-रूप जिसका । पांच मिल लाते रूप जिसका । धनुर्धर ॥ ३१ ॥ पंच भूतोंका आश्रय लेकर । उनके संयोगसे ले आकार । और वियोगमें है जाता मर । नाम रूपादिक ॥ ३२ ॥ अहंकारसे अलग-सा बना आत्मा ही अधिदैव— यह है अधिभूत कहलाता । पुरुष अधिदैव कहलाता । जो प्रकृति उपार्जित भोगता । भोग सर्व ॥ ३३ ॥ चक्षु है जो चेतनका । अध्यक्ष है इंद्रियोंका । वृक्ष संकल्प-पक्षिका । देहांतमें ॥ ३४ ॥ परमात्मा ही है जो किंतु भिन्न । है अहंकार निद्रामें मगन । इसीलिये स्वप्नमें होता खिन्न । अथवा प्रसन्न भी ॥ ३५ ॥ अधि-भूत विनाशी जो जीवत्व अधि-दैवत । अधि-यज्ञ स्वयं मैं हूं देहमें यज्ञ-पूत जो ॥ ४ ॥ २२५ सातत्ययोग (29)
अध्याय ६: आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग
कहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव। इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥ शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ -- यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन । करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है— यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त। वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥ फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान। किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥ वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब। अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥ अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता। और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥ सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख। ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥ जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं। अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥ मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी। उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥ ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता। जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥ किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज। कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥ विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका। प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी २२६
वैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर । विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥ वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर । शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥ कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके । देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥ फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम । इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥ ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण । ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥ इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ । तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥ अंतकालकी स्थितिका वर्णन— जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण । देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥ सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना । जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥ तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व । किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥ पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल । वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥ श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन । जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥ अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥ प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत । जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥ २२७ सातत्ययोग
मेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है— अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे। जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥ शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर। मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥ इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें। सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥ अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है। पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥ जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके। तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥ वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई। या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥ मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर। दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥ या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा। इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥ वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर। भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥ मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर। छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥ इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा— अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण। प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥ कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे। सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥ गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे। . गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी २२८
वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर । उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥ जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान । देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित । जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥ मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान । इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥ आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना । मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥ संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार । फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥ अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब । संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥ मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण । मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥ लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता । पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६ तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू । मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥ २२९ सातत्ययोग
इसलिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर- यह स्थिति होगी कैसे। यदि है संदेह वैसे। देख साधना कर ऐसे। तब दे दोष ॥८०॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥ अजी ! अभ्यास-योग बलसे। चितको जोड़ तू भलाईसे। लूला भी है उपाय बलसे। चढ़ता पहाड़ ॥८१॥ वैसे अभ्याससे निरंतर। परम-पुरुषकी मुहर। लगा चित पर फिर शरीर। रहे या ना रहे ॥८२॥ नाना वृत्तियोंमें जो डूबता। वह जब आत्मको वरता। तब तन रहता या न रहता। स्मरता कौन ॥८३॥ सरिता-प्रवाहके जो साथ। सागरसे मिलता सतत। वह जल देखता क्या बात। पीछे होता है क्या ? ॥८४॥ जैसे वह समुद्र बन जाता। वैसे चित्तका चैतन्य हो जाता। वहां जन्म-मरण ही मिटता। जो है घनानंद ॥८५॥ कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥९०॥ ब्रह्मका और योगका स्वरूप अस्तित्व जिसका आकार रहित। जन्म-मृत्यु बिन रहता सतत। वह है पूर्णत्वसे पूर्ण भरित। देखता पूर्ण ॥८६॥ जुटे अभ्यासमें चित्त न करें अन्य चिंतन । योगी निश्चित पाता है महा-पुरुष दिव्यको ॥ सर्वज्ञ कर्ता कवि जो पुराण है सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप । आदित्य दीप्ती तमसे परे जो जगन्नियंता स्मरता सदा ही ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३०
गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन । जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥ प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब । उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥ आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती । किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥ जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान । नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल । स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥ पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर । हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥ अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे । आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥ जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे । निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥ वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका । जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥ मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ । योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥ प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके सद्भक्तिसे निश्चल योग-युक्त । भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥ २३१ सातत्ययोग
जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता । घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥ अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी । ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥ ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम । ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥ यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग- सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥ आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन । यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥ ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे । वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥ तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर । प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥ विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर । देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥ इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ । निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥ गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता विरक्त जाके जिसमें समाते । जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २३२
उसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन। इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥ ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध। तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥ ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता। कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥ अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन। सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥ किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल। जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥ मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक। करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥ बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना— किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता। सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥ स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण। टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥ जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार। लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥ लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें। होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥ तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर। ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥ रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर। तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥ (30) २३३ सातत्ययोग
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण । प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥ तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म । वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥ जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन । नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥ मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?— अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन । यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥ इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर । मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥ तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण । कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥ यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन । नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥ करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे । ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥ अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे । लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥ मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो । दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी २३४
जीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ— विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर । हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥ उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग । वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥ ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर । समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥ होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण । तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥ अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन । तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥ भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति । न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥ जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता । यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥ मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण । सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥ संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह । मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥ फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी । तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥ अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल । आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥ उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली । भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥ भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं । इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥ २३५ सातत्ययोग
तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें । ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥ जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें । दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥ ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित । तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥ फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड । है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥ दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता । सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥ दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल । व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥ संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन । सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥ जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत । जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥ भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ । चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥ जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र । विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥ राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा । तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥ कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन । तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥ शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर । अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥ स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन । या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥ ज्ञानेश्वरी २३६
ऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर । हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं- वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी । किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥ अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर । वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥ जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान । शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥ उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर । उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥ सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर । सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥ यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत । देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥ सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत । होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥ ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें । पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥ सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है । रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥ २३७ सातत्ययोग
ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर । कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय । ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥ अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर । प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥ शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें । फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥ वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके । निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥ जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता । युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥ कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती । ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥ देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन । पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥ त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार । होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥ दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे । होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥ उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही । दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३८
आते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय । स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥ वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप । औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्राप्त होता है— सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं । जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥ आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व । किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥ इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त । यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥ पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण । तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥ घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण । जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥ न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत । दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥ यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता । जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥ जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता । वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥ अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे । नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥ २३९ सातत्ययोग