भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 304

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण । प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥ तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म । वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥ जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन । नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥ मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?— अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन । यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥ इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर । मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥ तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण । कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥ यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन । नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥ करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे । ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥ अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे । लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥ मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो । दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी २३४