ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन। इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥ ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध। तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥ ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता। कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥ अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन। सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥ किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल। जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥ मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक। करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥ बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना— किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता। सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥ स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण। टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥ जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार। लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥ लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें। होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥ तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर। ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥ रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर। तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥ (30) २३३ सातत्ययोग