भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता । घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥ अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी । ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥ ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम । ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥ यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग- सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥ आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन । यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥ ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे । वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥ तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर । प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥ विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर । देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥ इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ । निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥ गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता विरक्त जाके जिसमें समाते । जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २३२