भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन । जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥ प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब । उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥ आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती । किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥ जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान । नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल । स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥ पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर । हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥ अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे । आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥ जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे । निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥ वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका । जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥ मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ । योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥ प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके सद्‌भक्तिसे निश्चल योग-युक्त । भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥ २३१ सातत्ययोग

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