ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ— विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर । हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥ उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग । वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥ ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर । समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥ होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण । तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥ अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन । तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥ भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति । न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥ जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता । यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥ मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण । सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥ संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह । मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥ फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी । तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥ अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल । आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥ उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली । भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥ भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं । इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥ २३५ सातत्ययोग