भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें । ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥ जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें । दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥ ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित । तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥ फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड । है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥ दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता । सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥ दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल । व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥ संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन । सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥ जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत । जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥ भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ । चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥ जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र । विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥ राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा । तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥ कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन । तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥ शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर । अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥ स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन । या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥ ज्ञानेश्वरी २३६