ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर । हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं- वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी । किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥ अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर । वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥ जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान । शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥ उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर । उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥ सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर । सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥ यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत । देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥ सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत । होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥ ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें । पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥ सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है । रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥ २३७ सातत्ययोग