भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 308

ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर । कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय । ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥ अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर । प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥ शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें । फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥ वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके । निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥ जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता । युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥ कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती । ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥ देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन । पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥ त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार । होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥ दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे । होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥ उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही । दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३८