ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 309, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंआते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय । स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥ वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप । औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्राप्त होता है— सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं । जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥ आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व । किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥ इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त । यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥ पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण । तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥ घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण । जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥ न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत । दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥ यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता । जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥ जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता । वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥ अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे । नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥ २३९ सातत्ययोग