ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण । वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥ उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता — अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक । न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥ आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका । आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥ इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर । न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥ किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान । नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥ वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर । दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥ अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार । मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥ जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता । प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥ वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना । इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥ कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम । वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥ मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो । जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २४०