ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर । कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय । ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥ अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर । प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥ शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें । फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥ वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके । निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥ जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता । युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥ कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती । ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥ देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन । पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥ त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार । होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥ दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे । होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥ उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही । दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २३८
आते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय । स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥ वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप । औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्राप्त होता है— सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं । जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥ आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व । किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥ इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त । यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥ पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण । तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥ घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण । जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥ न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत । दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥ यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता । जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥ जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता । वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥ अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे । नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥ २३९ सातत्ययोग
पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण । वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥ उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता — अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक । न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥ आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका । आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥ इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर । न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥ किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान । नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥ वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर । दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥ अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार । मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥ जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता । प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥ वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना । इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥ कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम । वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥ मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो । जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २४०
वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर । जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥ अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा । इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥ तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत । इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥ किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन । होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥ यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर । जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥ ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है— जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन । पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥ यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म । वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥ जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान । सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥ संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान । भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥ यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर । वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥ जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर । या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥ वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण । बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥ अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया । चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥ २४१ (31) साधकसंदेश
जैसे डली जो गूहकी । रूप न लेती ईखकी । बुध्दिमंत ले बुध्दिकी । कितनी थाह ॥ २०० ॥ अथवा लोहका कनक भया । यह पारसने सहज किया । फिर उसका लोहपन आया । यह असंभव ॥ १ ॥ घृत बनकर एक बार । असंभव फिर होना क्षीर । वैसे ही वह धाम पाकर । नहीं पुनरावर्तन ॥ २ ॥ ऐसा वह मेरा परम । निजधाम सर्वोत्तम । अंतःकरणका मर्म । कहता तुझसे ॥ ३ ॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ मृत्यु समयकी दो स्थितियां- इसको जाननेका प्रकार । अति सुलभ है इक और । देह त्यागके स-अवसर । पाते योगीजन ॥ ४ ॥ अकस्मात ऐसा भी घड़ता । अनवसर तन गिरता । तब है पुनः आना पड़ता । देहमें उन्हें ॥ ५ ॥ देह छोड़कर सकाल । ब्रह्म होते हैं वे तत्काल । देह छोड़कर अकाल । आते संसारमें ॥ ६ ॥ सायुज्य तथा पुनरावर्तन । वह है सब अवसराधीन । वह अवसर कहूं महान । तुझसे अब ॥ ७ ॥ अब तू सुन अर्जुन । मृत्यूके नशेमें जान । पांचों करते प्रयाण । अपनी राहसे ॥ ८ ॥ होता है प्रयाणकाल प्राप्त । न होती है बुद्धि भ्रम-ग्रस्त । तथा न होता सब विस्मृत । न डरता मन ॥ ९ ॥ किस काल गए। कैसे तजके देह साधक । आता है या न आता है कहता मैं सुनो अब ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी २४२
यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन । आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥ चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न । अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥ हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब । देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥ वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे । तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥ न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन । तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥ जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता । तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥ पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण । शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥ किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी । कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥ अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास । जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥ रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल । अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस । तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥ अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण । जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥ २४३ वाक्यप्रबोध
मृत्युसमयकी पहली स्थिति-चैतन्यप्रधान, प्रकाश प्रधान— ऐसे समय-योगमें नियत । होता है जिसका देहपात । जो ब्रह्म-विद करता प्राप्त । परमपद ॥ २१ ॥ सुन तू अब धनुर्धर । सामर्थ्य जो सु-अवसर । सरल मार्ग है स्वपुर । पहुंचनेका ॥ २२ ॥ अग्नि प्रथम पावरी । ज्योतिर्मयता दूसरी । तथा दिवस तीसरी । शुक्लपक्ष ॥ २३ ॥ तथा षण्मास उत्तरायण । वह है ऊपरका सोपान । पाते हैं सायुज्य-सिद्धिदिन । इससे योगी ॥ २४ ॥ उत्तम काल है बहुत । कहलाता अर्चिरा पथ । कहता हूं अकाल पार्थ । सुन तू अब ॥ २५ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥ तम प्रधान मृत्यु समय— समयमें जब प्रयाणके । उभार आवे वात-श्लेष्मके । आवरण हो अंधःकारके । अंतःकरणपे ॥ २६ ॥ इंद्रियां होती जैसे काष्ठ । स्मृति होती भ्रममें नष्ट । मन होता है पथ भ्रष्ट । तथा घुटता प्राण ॥ २७ ॥ मिटता अग्निका अग्निपन । रहता है धूम्र ही संपूर्ण । जिसमें चेतनाकी घुटन । होती शरीरमें ॥ २८ ॥ जैसे चंद्रपर बादल । आता है घना औ' सजल । तब ना घना या उज्ज्वल । रहता प्रकाश ॥ २९ ॥ न मरता वह न सावध । जीवितसह पडता स्तब्ध । ऐसी आयु-कालकी मर्याद- । प्रतीक्षामें रहता ॥ २३० ॥ धूमसे रात कृष्णार्ध जोड़के दक्षिणायन । जाता जो लौटता पीछे पहुंचे चंद्र-लोकको ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४
जहां मन-बुद्धि-करण । डूबा धूम कुलावरण । वहां अनुभवका ज्ञान । डूबा जीवनका ॥ ३१ ॥ जहां हाथका भी जाता । वहां लाभकी क्या कथा । प्रयाणकाल अवस्था । होती ऐसे ॥ ३२ ॥ यहां देहमें ऐसी स्थिति । वहां कृष्ण पक्ष औ' रात । षण्मासमें घटिका आती । दक्षिणायनकी ॥ ३३ ॥ जब पुनरावर्तनका घर । प्रयाण समयमें जाता भर । तब स्वरूप-सिद्धि समाचार । सुने कौन ॥ ३४ ॥ ऐसा जिस योगीका शरीर पडता । योगी होनेसे चंद्रलोक ही मिलता । वहांसे फिर पुनरावर्तन होता । संसारमें ॥ ३५ ॥ कहा मैने अनाल अर्जुन । वह यही है इसको जान । धूम्रमार्ग पुनरावर्तन । यही है जो ॥ ३६ ॥ यहां वह अर्चिरामार्ग । चलता हुआ औ' सलग । सहज सुलभ सुभग । मोक्ष-दायक ॥ ३७ ॥ शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥ किंतु जो सद्रूप है वह किसी मार्गसे आय तो भी ब्रह्मपद पाता है - ये दो ऐसे अनादि पथ । सरल तथा टेढा पार्थ । तभी बताये मैंने सार्थ । तुझको अब ॥ ३८ ॥ क्यों कि मार्ग अमार्ग देखना । सच्चा झूठा यह जान लेना । हित अहित समझलेना । अपने हितार्थ ॥ ३९ ॥ कोई भली नांव छोडकर । कूदेगा क्या नदीके भीतर । तथा सीधी राह जानकर । चलेगा क्या कुपथ ॥ २४० ॥ जानता जो विष औ' अमृत । छोडता है क्या वह अमृत । वैसा कोई छोड सीधा पथ । चलें क्यों टेढा ॥ ४१ ॥ प्रकाश और अंधार दोनों मार्ग अनादि हैं । निस्तार करता एक घेरेमें एक डालता ॥ २६ ॥ २४५ आत्मबोध
इसीलिये अर्जुन प्रथम । जानना उत्तम अधम । जाननेसे समयमें काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४२ ॥ वैसे देहांतमें बडा विषम । इन मार्गोंका है बडा संभ्रम । जीवन भर अभ्यासका काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४३ ॥ अर्चिरा मार्ग भूलकर । पडे तो धूम्र पथपर । पडेंगे संसार-सागर । भंवर-चक्रमैं ॥ ४४ ॥ देख कर ये बडे सायास । किस भांति मिटेंगे त्रास । सोचकर यह पथ खास । कहा जायेगा ॥ ४५ ॥ ऐसे ब्रह्मपद महान । दूसरेसे पुनरावर्तन । वैसे अंतकालका क्षण । जैसा हो वैसा मिलेगा ॥ ४६ ॥ नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥ तब कहे देव यह नहीं ऐसा । कब क्या मिलेगा जाने कोन कैसा । देह-पातसे ब्रह्म बनता जैसा । रहा मार्गसे ही ॥ ४७ ॥ तब रहे या जाये यह तन । हम वह ब्रह्म है यह जान । डोरीपे सर्पत्वका आरोपण । मिथ्या है इसलिये ॥ ४८ ॥ मुझे तरलपन है या नहीं । भासता क्या यह पानीको कहीं । पानी जो है पानी ही कभी कहीं । वैसे ही पार्थ ॥ ४९ ॥ तरंगाकारसे न जन्मता । तरंग लोपसे न मरता । देहमें रहते ब्रह्म होता । देहसे जो ॥ २५० ॥ शरीरत्व नहीं रहा खास । अब उन तत्वज्ञोंके पास । भला होगा क्या किसका नाश । इसमें क्या रहा ॥ ५१ ॥ देशकालादि यदि संपूर्ण । भये आपही जब तत्क्षण । फिर पथका अनुसंधान । रहा किसके लिये ॥ ५२ ॥
ऐसे जो जानके मार्ग योगी होता न मोहित । तभी तू सर्वदा पार्थ योगसे युक्त हो रह ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी २४६
अजी ! जब यह घंट फूटता । घटाकाश है राहमें लगता । वह महदाकाशमें मिलता । या रहता वहीं ॥ ५३ ॥ यहां है ऐसा प्रकार । मिटता मात्र आकार । गगन है एकाकार । सदा सर्वत्र ॥ ५४ ॥ होता है जब यह बोध । न रहता मार्गका द्वैध । बनने पर सोऽहं सिद्ध । योगियोंको ॥ ५५ ॥ इसका कारण पांडुसुत । तुम्हे बनना योग-युक्त । जिससे सर्वदा समता । रहगी अपनेमें ॥ ५६ ॥ तबहो कुछ भी कभी । देह बंध हो न हो तभी । अखंड ब्रह्म बोध कभी । न बिगडेगा ॥ ५७॥ सभी प्रकारके मोहसे मुक्त मनुष्य— वह कल्पारंभमें न जनमता । कल्पांतमें भी वह नहीं मरता । स्वर्ग संसारादिमें नहीं फंसता । सृष्टि-कालमें ॥ ५८ ॥ जिस बोधसे वह योगी बनता । उसकी सरलता अनुभवता । अन्य भोगोंको तौलकर तजता । स्वरूपावस्थामें ॥ ५९ ॥ अर्जुन इंद्रादि देव । मानते अपना सर्वस्व । वह राज्य-भोग वैभव । मानता तुच्छ ॥ २६० ॥ वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥ जो वेदका यज्ञ तथा तपोंका दानादिका पुण्य कहा गया है । जो लांघता सर्व हि जानके तो योगी चढे आद्य महान धाम ॥ २८ ॥ २४५ शांतत्ययोग
यदि पुण्य वेदाध्ययनका । तथा बहार यज्ञ-फलका । प्राप्त सर्वस्व तप दानका । धनंजय ॥ ६१ ॥ मिलकर सब पुण्यका खेत । बहर पकने पर भी पार्थ । ब्रह्मानंदकी तुलनामें व्यर्थ । जो नित्य निर्मल ॥ ६२ ॥ तुलनामें जो नित्यानंदके । तुलामें डाले तो उपमाके । थोड़ा नहीं है उस सुखके । साधन यज्ञादि हैं ॥ ६३ ॥ न नासता जो न खूटता । भोगीको सदा तृप्ति देता । भावी महा-सुखका होता । बंधुही यह ॥ ६४ ॥ ऐसे जिस दृश्य सुखका । अधिष्ठान हैं संसारका । प्राप्तव्य है शत-मखका । न मिलता कभी ॥ ६५ ॥ उस अलौकिकको योगीश्वर । तोलता है हथेली पर । स-कौतुक अनुमान कर । कहता हलका ॥ ६६ ॥ फिर जिस सुखका अर्जुन । रचकर भलासा सोपान । प्राप्त करता है सिंहासन । ब्रह्म-सुखका ॥ ६७ ॥ ज्ञानेश्वरका उपसंहार— ऐसा जो चराचरैक्य भाग्य । ब्रह्मेशके आराधना योग्य । योगी जनके महायोग्य । योग धन जो ॥ ६८ ॥ वह सकल कलाकी कला । परमानंदका है पुतला । जीवोंका परम जिव्हाला । विश्वके जो ॥ ६९ ॥ सर्वज्ञताका है जो जीवन । यादव कुलदीप पावन । बोला धनंजयसे श्रीकृष्ण । इस भांति ॥ २७० ॥ कुरु क्षेत्रकी ऐसी कथा । संजय राजासे कहता । उसीको है आगे सुनाता । ज्ञानदेव निवृत्तिदास ॥ २७१ ॥ गीता श्लोक २८ ज्ञानेश्वरी ओवी २७१.
राज-विद्या = समर्पणयोग ९ पित्र-रूपमें गुरु-वंदन— अजी ! ध्यानसे चित दीजिये । सब सुखका पात्र बनिये । प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये । प्रकट बात ॥ १ ॥ प्रौढ़तासे यह नहीं बोलता । आप सर्वज्ञोंसे स-ममता । ध्यान दें यह विनय करता । सर्वज्ञ-समाजसे ॥ २ ॥ लाड़लेके सब लाड़ पूर्ण होते । सब ही मनोरथ संपन्न होते । मातापिता जब हैं श्रीमंत होते । आपके समान ॥ ३ ॥ आपकी कृपा-दृष्टिके रससे । प्रसन्नताका बाग खिलनेसे । उसकी छायामें सोता, सुखसे । शांत जो मैं ॥ ४ ॥ प्रभु आप हैं सुखामृतके सागर । हम पाते शीतलता इच्छानुसार । यहां पर भी स्नेहार्थ सकुचाकर । कहां पायें शांति ॥ ५ ॥ यों तो बालक तुतलाता । टेढ़ा मेढ़ा पग रखता । उससे स-कौतुक माता । रीझती सदा ॥ ६ ॥ वैसा आप सन्तोंका प्रेम । चाहते जिसे सदा हम । इसीलिये करते प्रेम । श्री चरणोंमें ॥ ७ ॥ बोलनेमें क्या है मेरी योग्यता । जहां सर्वज्ञ भावा-दृश श्रोता । सरस्वती सुत है क्या सीखता । देकर पाठ ॥ ८ ॥ कितना ही बड़ा क्यों न हो ज्योतिरिंगण । नहीं प्रकाशता भानुबिंबके समान । नहीं मिलता अमृत थाळ सम पकवान्न । उसका उपाय क्या ? ॥ ९ ॥ (32)
हिमकरको पंखा झलना । नाद-ब्रह्मको गाना सुनाना । अथवा भूषणको सजाना । होता क्या ऐसा ? ॥ १० ॥ कहिए सुगंधको क्या सूंघना । सागरको कहां स्नान कराना । आकाशको जिसमें समाना । क्या लावें ऐसा ॥ ११ ॥ आप सब जिससे तृप्त होंगे । जिसको सु-प्रवचन कहेंगे । सुनके मनमें प्रसन्न होंगे । ऐसा वक्तृत्व कहां ? ॥ १२ ॥ किंतु प्रकट होते ही गभस्ति । न उतारते क्या हाथ आरती । न देते क्या अर्ध्यांजलि स-भक्ति । महा-सागरको ॥ १३ ॥ आप हैं स्वामी महेशकी मूर्ति । दुबला मैं पूजता हूँ स-भक्ति । तभी बिल्व छोड़ दूं गंगावती । स्वीकार करेंगे ॥ १४ ॥ पिताकी थालमें हाथ डाल कर । खिलाता शिशु जब पिताको कौर । प्रेम-भरसे तब पिता सत्वर । झुकके खोलता मुख ॥ १५ ॥ वैसा मैं करता हूँ आपसे । तुतलाता हूँ बाल-मतिसे । तथा सुनते आप मोदसे । यह है प्रेम-भाव ॥ १६ ॥ ऐसी आत्मीयतासे मोहित । सन्त-समूह है अति-ग्रस्त । नहीं होगा स्नेहका किंचित् । भार आपको ॥ १७ ॥ आघात करता जब शिशुका मुख । प्रेमार्द्र-माता स्तन्य देती अधिक । रोषसे बढ़ता सदा प्रेम अधिक । प्रिय-वस्तुके ॥ १८ ॥ मुझ बालकका यह वचन । आपका निद्रस्त कृपालूपन । जागृत करेगा यह मैं जान । बोला हूँ आपसे ॥ १९ ॥ कार्यकी और गुरु-कृपाकी महत्ता— पकाते क्या कभी पालमें चांदनीको । पंखेसे गति देते हैं क्या पवनको । खोल चढ़ाते कैसे कहो गगनको । मुझसे आप ॥ २० ॥ तरल नहीं करना पड़ता पानी । नवनीतमें नहीं पैठती मथनी । लज्जित हो अभिव्यक्त न होती वाणी । आपके सम्मुख ॥ २१ ॥ शब्द-ब्रह्म जिस खटौले पर । सोता है शब्द कुंठित हो कर । देश-भाषामें यह गीता-सार । कहनेकी योग्यता क्या ? ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २५०
किंतु कहता हूँ कर साहस । मनमें धरके मै एक आस । आपके सम्मुख कर साहस । प्रिय बनूं आपके ॥ २३ ॥ अजी ! शीतल जो चंद्रमासे । जीवनदायी है अमृतसे । पूर्ण करता अवधानसे । मेरी चाह ॥ २४ ॥ अजी ! कृपा-दृष्टिकी वृष्टि आपकी । करती है सृष्टि सकलार्थ मतिकी । सूखेगी कली अंकुरीत मतिकी । आपकी उदासीसे ॥ २५ ॥ देते हैं आप सहज अवधान । मिलता उससे वक्तृत्वको अन्न । जिससे होते हैं अक्षर संपन्न । सिद्धान्तोंसे ॥ २६ ॥ राह देखता तब अर्थ शब्दकी । सृष्टी होती नव-नव आशयकी । बहार आती है भाव सुमनोंकी । मति पर सतत ॥ २७ ॥ रहता है जहां संवादका उल्लास । बरसता स्वारस्वत हृदयाकाश । सूखता है वह सारस्वतका रस । जहां श्रोता हो दुश्चित्त ॥ २८ ॥ अजी ! चंद्रकान्त मणि द्रवता । वह द्रावकता चंद्र ही देता । वैसा वक्ता वक्ता नहीं हो सकता । बिन श्रोताके ॥ २९ ॥ हमें अब मधुर कर लेना । ऐसा क्या तंदुलोंको है कहना । या गुड़ियाको प्रार्थना करना । सूत्र धारसे कया ॥ ३० ॥ वह क्या गुड़ियाके लिये नचाता । या अपना कल-ज्ञान है बढ़ता । इसीलिए हमारा क्या आता जाता । इस झमेलेसे ॥ ३१ ॥ “अरे क्या हुआ पूछा तब श्रीगुरुने । कहा “तुम्हारा विनय सुना हमने ।” “कहो अब क्या कहा श्री नारायणने । धनंजयसे ॥ ३२ ॥ संतोषसे निवृत्तिका दास । “जी ! जी !!” कह कर स-उल्लास । बोले किया यह उपदेश । श्री कृष्णने तब ॥ ३३ ॥ भगवान उवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥ श्री भगवानने कहा कहूंगा गुह्य जो श्रेष्ठ निष्पाप तुझसे अब । विज्ञान सह जो ज्ञान छुडाता दोषसे बडे ॥ १ ॥ २५१ राज-विद्या-समर्पणयोग
सरल बुद्धिके जिज्ञासुके सम्मुख गुह्यका उद्घाटन— अथवा जो है यह बीज । कहता हूँ मैं तुझे आज । मेरे हृदयका है गुह्य । जीवनका पार्थ ॥ ३४ ॥ हृदयका गूढ़ क्यों ऐसा खोलना । वह गूढ़ भी मुझसे क्यों कहना । आती ऐसी यदि मनमें कल्पना । है वह स्वाभाविक ॥ ३५ ॥ तो तू सुन ले हे प्राज्ञ । तू है आस्थाकी ही संज्ञा । कही बातकी अवज्ञा । जानता नहीं ॥ ३६ ॥ टूटा तब अपना गूढ़पन । कहें न कहने जैसे वचन । किंतु अपना जो अन्तःकरण । उतरे तुझमें ॥ ३७ ॥ अजी ! स्तनमें क्षीर गुप्त होता । स्तनको क्यों मधुर नहीं होता । आत्मीय मिलता तब स्रवता । सहज-भावसे ॥ ३८ ॥ खत्तीमेंसे बीज निकाला । जोती हुई भूमिमें डाला । “व्यर्थ गया वह” ऐसा भला । कह सकते क्या ? ॥ ३९ ॥ जब सुमन औ, शुद्ध मति । अनिंदक जो अन्यन-गति । गूढ़ बात भी उसके प्रति । सुखसे कहना ॥ ४० ॥ इन गुणोंसे संपन्न अब । बिना तेरे कोई नहीं तब । तुझसे अपना गुह्य सब । नहीं छिपाता ॥ ४१ ॥ गुरु-मुखसे श्रवण करनेके बादही पवित्र ज्ञानका अनुभव— गूढ़ कहनेसे पुनः पुनः । चमत्कृत होगा तेरा मन । अब कहूँगा ज्ञान-विज्ञान । सहज-भावसे ॥ ४२ ॥ सत्य-असत्य सन जाने पर । उसका यथार्थ चुनाव कर । निकालना जैसे परख कर । कहूँगा मैं वैसे ॥ ४३ ॥ अपनी चोंचकी संडसीसे जैसे । विभेदता हंस नीर-क्षीर वैसे । कहूँगा ज्ञान-विज्ञान तुझसे । रहस्य मैं आज ॥ ४४ ॥ अनाजसे सना हुआ भूसा । हवासे उड़ाकर जैसा । धानका ढेर होता है आपका । वैसे ही पार्थ ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी २५२
अजी ! जानकारको वह ज्ञान । भवको करके भवमें लीन । देता मोक्ष-लक्ष्मीका सिंहासन । मोक्षार्थीको ॥ ४६ ॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥ ज्ञान जो विद्याओंके ग्राममें । गुरुत्वसे आचार्य-पदमें । सकल गुह्यके स्वामित्वमें । पवित्रम है ॥ ४७॥ तथा धर्मका जो निज-धाम । वैसे ही उत्तमका उत्तम । पानेसे जिसे नहीं है काम । जन्मांतरका ॥ ४८ ॥ दीखा अल्पसा गुरु-मुखसे उदित । तथा हृदयमें स्वयमेव स्थित । प्रत्यक्ष रूपमें होता है अनुभूत । अपने आप ॥ ४९ ॥ सुखकी पावरीसे हो उत्थान । जिससे करना होता मिलन । होनेसे अजी ! उससे मिलन । मिटता है भोग ॥ ५० ॥ किंतु भोगके इस तीर । चित्त खडा सुखसे भर । वैसे सुलभ औ' सुन्दर । तथा पर-ब्रह्म ॥ ५१ ॥ इसकी है एक महत्ता । पाने पर कभी नहीं खो जाता । अनुभवनेसे नहीं घटता । औ' बिगड़ता नहीं ॥ ५२ ॥ अर्जुन ! तू है तर्क-कुशल । यहां होकरके शंकाकुल । ऐसी वस्तु लोंगोंमें कुशल । रही कैसे जी ॥ ५३ ॥ वृद्धिके लिए एकोत्तरकी । गोदमें जाते जलती ज्वालाकी । वे क्या अनायाससे सु-सुखकी । छोड़ेंगे क्या माधुरी ॥ ५४॥ किंतु पवित्र तथा रम्य । वैसे सुखोपायसे गम्य । तथा स्वसुख परंतु धर्म्य । अपनेमें ही मिलता ॥ ५५ ॥ मूर्ख लोग हृदयको छोडकर बाहरी सुखके पीछे पडते हैं — सब प्रकारसे ऐसा सुखकर । किंतु लोक सेवनसे बचकर । भ्रमका कारण यह धनुर्धर । रहा वह तज तू ॥ ५६ ॥ ———————————————————————————————— राज-विद्या महा गुह्य उत्तमोत्तम पावन । प्रत्यक्ष बोध-दाता जो धर्म-सार सनातन ॥ २ ॥ २५३ राज-विद्या-समर्पणयोग
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥ देख तू दूध पवित्र तथा मधुर । पास ही है त्वचाके पदरके पार । किंतु किलनी सदा उसे छोड़कर । चूसती रक्त-मात्र ॥ ५७ ॥ या कमलकंद औ' दादुर । रहते हैं सदा एक घर । किंतु पराग खाता भ्रमर । दूसरा कीचड़ ॥ ५८ ॥ अथवा अभागीके परिवारमें । गड़ी स्वर्ण मुद्रा पड़ी सहस्रमें । किंतु भूखे मरते हैं दारिद्र्यमें । बैठकर पार्थ ॥ ५९ ॥ वैसे हृदयमें बसा है राम । सकलैश्वर्य सुखका आराम । किंतु भ्रांतका है सदा काम । विषयका ही ॥ ६० ॥ दूर देख करके मृगजल । आधा निगला अमृत उगल । शुक्ता लाभार्थ डाला निकाल । गलेका पारसमणि ॥ ६१ ॥ मैं सर्वत्र हूं, यह विश्व मेरा ही विस्तार है— अहं ममतामें जो व्यस्त । मुझे नहीं पाते हैं त्रस्त । जन्म मृत्यु प्रवाह ग्रस्त । रहते पार्थ ॥ ६२ ॥ नहीं तो मैं रहता हूँ कैसा । सम्मुख भानु-बिंब हूँ ऐसा । कभी वह उदयअस्त-सा । किंतु मैं हूँ सतत ॥ ७३ ॥ मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ नाम है मेरे विस्तारका । जान तू संपूर्ण जगतका । जैसा दही होता है दूधका । सहज जमकर ॥ ६४ ॥ जैसा बीजका वृक्ष बनता । या सोनेका गहना बनता । वैसा है मेरा विस्तार होता । जगतके रूपमें ॥ ६५ ॥
लोग नास्तक जो धर्म अश्रद्धासे न चाहते । मृत्यूकी चलते राह भवमें मुझ छोडके ॥ ३ ॥ अव्यक्त रूपसे मैंने वेरा है जगको सब । मुझमें रहते भूत उनमें मैं नहीं रहा ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४
वह अव्यक्त जो जमा हुआ । वही विश्वाकार पिछला हुआ । अमूर्त मूर्तमें मै फैला हुआ । त्रैलोक्य रूपमें ॥ ६६ ॥ महत्तत्वसे शरीर तक । यहांके भूत जो हैं अशेष । मुझमें भास होते सम्यक । पानी पर झागसा ॥ ६७ ॥ जैसे झागमें न दीखता नीर । स्वप्नकी त्रिविधता धनुर्धर । नहीं दीखती जैसे जगकर । वैसे ही जान ॥ ६८ ॥ भास होते हैं भूत मुझमें । किंतु मैं नहीं जान उनमें । कही है पहले सातवेंमें । तुझे यह बात ॥ ६९ ॥ कही हुई बातका तब । विचार रहने दो अब । तेरा ध्यान मुझमें अब । पैठने दो ॥ ७० ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ हमारा भाव जो प्रकृति अतीत । देखने लगो तो कल्पना रहित । मुझमें सभी भूत हैं यह व्यर्थ । सब मैं होनेसे ॥ ७१ ॥ संकल्पके संध्याकालमें जैसे । बुद्धि चक्षु मंद होते तमसे । तत्र अखंडित किंतु अस्पष्टसे । दीखते भूत भिन्न हैं ॥ ७१ ॥ होता जब संकल्प-संध्या लोप । तब अखंडित ही है स्वरूप । संदेह जाते जैसे होता लोप । मालाका सर्पपन ॥ ७३ ॥ मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व उत्पन्न होता है भूमिमेंसे क्या अपने आप । अंकुरते मटकोंके रूप । जैसे कुलाल मतिके छाप । अंकुरते सब ॥ ७४ ॥ है क्या सागरका पानी । बनी तरंगोंकी खानी । है अवांतर करनी । वायुकी वह ॥ ७५ ॥ है क्या कपासका उदर । कपड़ेका बना आगर । ओढण्याको है मनोहर । बना कपड़ा ॥ ७६ ॥ या नहीं मुझमें भूत देख तू दिव्य योग जो । सृजता पालता भूत उनमें रहता नहीं ॥ ५ ॥ २५५ राज-विद्या-समर्पणयोग
होने पर स्वर्णके अलंकार । स्वर्णत्वमें नहीं आता अंतर । नाना रूप उसके मनोहर । भूषितकी दृष्टिसे ॥ ७७ ॥ अजी ! प्रतिध्वनिका प्रत्युत्तर । या क्या प्रतिबिंबका आविष्कार । होता जो प्रति रूप ही आखर । या स्वयं भिन्न वस्तु ॥ ७८ ॥ वैसे है मेरा निर्मल स्वरूप । उसपे होता भूत-भावना आरोप । जिसका भासता है संकल्प । कल्पना रूप ॥ ७९ ॥ मिटती जब प्रकृति कल्पित । भूताभास नहीं रहता पार्थ । फिर शुद्ध स्वरूप अखंडित । रहता मेरा ॥ ८० ॥ जब है सिर चक्कर खा जाता । तब भासता है विश्व फिरता । अपनी कल्पनासे भास होता । भूतोंका अखंडमें ॥ ८१ ॥ वही तू कल्पना छोड़कर देख । मैं भूतोंमें भूत मुझमें अनेक । स्वप्नोंमें भी नहीं होगा सविवेक । विचारने योग्य ॥ ८२ ॥ भूतोंको करता मैं धारण । या भूतोंमें है मेरा जीवन । संकल्प सन्निपात कारण । होती ये बातें ॥ ८३ ॥ इसलिए सुन तू प्रियोत्तम । ऐसा मैं विश्वाका हूँ विश्वात्म । जो हो इस झूठे भूत-ग्राम । आश्रयदाता ॥ ८४ ॥ लेकर जैसे रवि-रश्मिका आधार । मृग-जल मिथ्या भासता भूमि पर वैसा जान भास भूतोंका मुझ पर । और मुझे सत्य ॥ ८५ ॥ ऐसा हूँ मैं भूत-भावन । औ' सब भूतोंसे अभिन्न । जैसे भानु-रश्मि अभिन्न । होते हैं पार्थ ॥ ८६ ॥ यह है ऐश्वर्य-योग हमारा । देखा न तूने भला धनुर्धरा । इसमें है क्या कह तू आसरा । भूत भेदका ॥ ८७ ॥ इसलिए भूत मुझसे । न है भिन्न किसी रूपसे । अथवा हूँ भिन्न भूतोंसे । मैं यह नहीं मानता ॥ ८८ ॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥ आकाशमें महा-वायु रहे सर्वत्र हो सदा । मुझमें हैं सभी भूत रहते जान तू यह ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी २५६
अजी ! आकाश होता जितना जैसा । पवन होता उतना ही औ' वैसा । हिलानेसे भास होता भिन्न ऐसा । नहीं तो उतना ही ॥ ८९ ॥ वैसे भूत मात्र मुझमें । भास होते हैं कल्पनामें । नहीं होता निर्विकल्पमें । वहां मैं ही सर्वत्र ॥ ९० ॥ नहीं औ' है यह कल्पनाका औरस । कल्पना लोपसे होता है वह अंश । कल्पनाके संग होता है भूताभास । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ मिटती है जब कल्पना मूलतः । तब वहां है या नहीं यह जाता । इसलिये तू आगे यह देखता । ऐश्वर्य योग ॥ ९२ ॥ ऐसा है यह प्रति-बोध सागर । अपनेको कर उसकी लहर । तब तू देखेगा सब स-चराचर । आप ही है ॥ ९३ ॥ ज्ञान-जागृति अब अर्जुन । हुई न यह पूछते कृष्ण । अब तो भंग हो द्वैत-स्वप्न । है जो मिथ्या ॥ ९४ ॥ फिर तुझे यदि शायद । आएगी कल्पनाकी नींव । मिटेगा अभेदका बोध । पड़ेगा स्वप्न ॥ ९५ ॥ जिससे टूटेगा निद्राका पथ । उद्बोध-रूप हो आप पार्थ । कहता अब ऐसा गुपित । खोल करके ॥ ९६ ॥ इंद्रियोंके अंतर्मुख होनेसे ईश्वरका अनुभव आता है— तब हे धनुर्धर स-धैर्य । अवधान दे तू धनंजय । सब भूतोंको है यह माया । करती हरनी जो ॥ ९७ ॥ सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ जिसका नाम ही प्रकृति है । तुझसे जो द्विविध कही है । एक अष्ठधा भेद्युत है । दूसरी जीव रूप ॥ ९८ ॥ मेरी प्रकृतिमें सोते भूत कल्पांतमें सभी । जगाता सबको मैं ही कल्प-आरंभमें स्वयं ॥ ७ ॥ २५७ -राज-विद्या-समर्पणयोग (33)