भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मृत्युसमयकी पहली स्थिति-चैतन्यप्रधान, प्रकाश प्रधान— ऐसे समय-योगमें नियत । होता है जिसका देहपात । जो ब्रह्म-विद करता प्राप्त । परमपद ॥ २१ ॥ सुन तू अब धनुर्धर । सामर्थ्य जो सु-अवसर । सरल मार्ग है स्वपुर । पहुंचनेका ॥ २२ ॥ अग्नि प्रथम पावरी । ज्योतिर्मयता दूसरी । तथा दिवस तीसरी । शुक्लपक्ष ॥ २३ ॥ तथा षण्मास उत्तरायण । वह है ऊपरका सोपान । पाते हैं सायुज्य-सिद्धिदिन । इससे योगी ॥ २४ ॥ उत्तम काल है बहुत । कहलाता अर्चिरा पथ । कहता हूं अकाल पार्थ । सुन तू अब ॥ २५ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥ तम प्रधान मृत्यु समय— समयमें जब प्रयाणके । उभार आवे वात-श्लेष्मके । आवरण हो अंधःकारके । अंतःकरणपे ॥ २६ ॥ इंद्रियां होती जैसे काष्ठ । स्मृति होती भ्रममें नष्ट । मन होता है पथ भ्रष्ट । तथा घुटता प्राण ॥ २७ ॥ मिटता अग्निका अग्निपन । रहता है धूम्र ही संपूर्ण । जिसमें चेतनाकी घुटन । होती शरीरमें ॥ २८ ॥ जैसे चंद्रपर बादल । आता है घना औ' सजल । तब ना घना या उज्ज्वल । रहता प्रकाश ॥ २९ ॥ न मरता वह न सावध । जीवितसह पडता स्तब्ध । ऐसी आयु-कालकी मर्याद- । प्रतीक्षामें रहता ॥ २३० ॥ धूमसे रात कृष्णार्ध जोड़के दक्षिणायन । जाता जो लौटता पीछे पहुंचे चंद्र-लोकको ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४