भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन । आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥ चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न । अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥ हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब । देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥ वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे । तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥ न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन । तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥ जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता । तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥ पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण । शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥ किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी । कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥ अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास । जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥ रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल । अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस । तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥ अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण । जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥ २४३ वाक्यप्रबोध