ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे डली जो गूहकी । रूप न लेती ईखकी । बुध्दिमंत ले बुध्दिकी । कितनी थाह ॥ २०० ॥ अथवा लोहका कनक भया । यह पारसने सहज किया । फिर उसका लोहपन आया । यह असंभव ॥ १ ॥ घृत बनकर एक बार । असंभव फिर होना क्षीर । वैसे ही वह धाम पाकर । नहीं पुनरावर्तन ॥ २ ॥ ऐसा वह मेरा परम । निजधाम सर्वोत्तम । अंतःकरणका मर्म । कहता तुझसे ॥ ३ ॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ मृत्यु समयकी दो स्थितियां- इसको जाननेका प्रकार । अति सुलभ है इक और । देह त्यागके स-अवसर । पाते योगीजन ॥ ४ ॥ अकस्मात ऐसा भी घड़ता । अनवसर तन गिरता । तब है पुनः आना पड़ता । देहमें उन्हें ॥ ५ ॥ देह छोड़कर सकाल । ब्रह्म होते हैं वे तत्काल । देह छोड़कर अकाल । आते संसारमें ॥ ६ ॥ सायुज्य तथा पुनरावर्तन । वह है सब अवसराधीन । वह अवसर कहूं महान । तुझसे अब ॥ ७ ॥ अब तू सुन अर्जुन । मृत्यूके नशेमें जान । पांचों करते प्रयाण । अपनी राहसे ॥ ८ ॥ होता है प्रयाणकाल प्राप्त । न होती है बुद्धि भ्रम-ग्रस्त । तथा न होता सब विस्मृत । न डरता मन ॥ ९ ॥ किस काल गए। कैसे तजके देह साधक । आता है या न आता है कहता मैं सुनो अब ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी २४२