भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 324

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥ देख तू दूध पवित्र तथा मधुर । पास ही है त्वचाके पदरके पार । किंतु किलनी सदा उसे छोड़कर । चूसती रक्त-मात्र ॥ ५७ ॥ या कमलकंद औ' दादुर । रहते हैं सदा एक घर । किंतु पराग खाता भ्रमर । दूसरा कीचड़ ॥ ५८ ॥ अथवा अभागीके परिवारमें । गड़ी स्वर्ण मुद्रा पड़ी सहस्रमें । किंतु भूखे मरते हैं दारिद्र्यमें । बैठकर पार्थ ॥ ५९ ॥ वैसे हृदयमें बसा है राम । सकलैश्वर्य सुखका आराम । किंतु भ्रांतका है सदा काम । विषयका ही ॥ ६० ॥ दूर देख करके मृगजल । आधा निगला अमृत उगल । शुक्ता लाभार्थ डाला निकाल । गलेका पारसमणि ॥ ६१ ॥ मैं सर्वत्र हूं, यह विश्व मेरा ही विस्तार है— अहं ममतामें जो व्यस्त । मुझे नहीं पाते हैं त्रस्त । जन्म मृत्यु प्रवाह ग्रस्त । रहते पार्थ ॥ ६२ ॥ नहीं तो मैं रहता हूँ कैसा । सम्मुख भानु-बिंब हूँ ऐसा । कभी वह उदयअस्त-सा । किंतु मैं हूँ सतत ॥ ७३ ॥ मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ नाम है मेरे विस्तारका । जान तू संपूर्ण जगतका । जैसा दही होता है दूधका । सहज जमकर ॥ ६४ ॥ जैसा बीजका वृक्ष बनता । या सोनेका गहना बनता । वैसा है मेरा विस्तार होता । जगतके रूपमें ॥ ६५ ॥


लोग नास्तक जो धर्म अश्रद्धासे न चाहते । मृत्यूकी चलते राह भवमें मुझ छोडके ॥ ३ ॥ अव्यक्त रूपसे मैंने वेरा है जगको सब । मुझमें रहते भूत उनमें मैं नहीं रहा ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४