ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥ देख तू दूध पवित्र तथा मधुर । पास ही है त्वचाके पदरके पार । किंतु किलनी सदा उसे छोड़कर । चूसती रक्त-मात्र ॥ ५७ ॥ या कमलकंद औ' दादुर । रहते हैं सदा एक घर । किंतु पराग खाता भ्रमर । दूसरा कीचड़ ॥ ५८ ॥ अथवा अभागीके परिवारमें । गड़ी स्वर्ण मुद्रा पड़ी सहस्रमें । किंतु भूखे मरते हैं दारिद्र्यमें । बैठकर पार्थ ॥ ५९ ॥ वैसे हृदयमें बसा है राम । सकलैश्वर्य सुखका आराम । किंतु भ्रांतका है सदा काम । विषयका ही ॥ ६० ॥ दूर देख करके मृगजल । आधा निगला अमृत उगल । शुक्ता लाभार्थ डाला निकाल । गलेका पारसमणि ॥ ६१ ॥ मैं सर्वत्र हूं, यह विश्व मेरा ही विस्तार है— अहं ममतामें जो व्यस्त । मुझे नहीं पाते हैं त्रस्त । जन्म मृत्यु प्रवाह ग्रस्त । रहते पार्थ ॥ ६२ ॥ नहीं तो मैं रहता हूँ कैसा । सम्मुख भानु-बिंब हूँ ऐसा । कभी वह उदयअस्त-सा । किंतु मैं हूँ सतत ॥ ७३ ॥ मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ नाम है मेरे विस्तारका । जान तू संपूर्ण जगतका । जैसा दही होता है दूधका । सहज जमकर ॥ ६४ ॥ जैसा बीजका वृक्ष बनता । या सोनेका गहना बनता । वैसा है मेरा विस्तार होता । जगतके रूपमें ॥ ६५ ॥
लोग नास्तक जो धर्म अश्रद्धासे न चाहते । मृत्यूकी चलते राह भवमें मुझ छोडके ॥ ३ ॥ अव्यक्त रूपसे मैंने वेरा है जगको सब । मुझमें रहते भूत उनमें मैं नहीं रहा ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी २४४
वह अव्यक्त जो जमा हुआ । वही विश्वाकार पिछला हुआ । अमूर्त मूर्तमें मै फैला हुआ । त्रैलोक्य रूपमें ॥ ६६ ॥ महत्तत्वसे शरीर तक । यहांके भूत जो हैं अशेष । मुझमें भास होते सम्यक । पानी पर झागसा ॥ ६७ ॥ जैसे झागमें न दीखता नीर । स्वप्नकी त्रिविधता धनुर्धर । नहीं दीखती जैसे जगकर । वैसे ही जान ॥ ६८ ॥ भास होते हैं भूत मुझमें । किंतु मैं नहीं जान उनमें । कही है पहले सातवेंमें । तुझे यह बात ॥ ६९ ॥ कही हुई बातका तब । विचार रहने दो अब । तेरा ध्यान मुझमें अब । पैठने दो ॥ ७० ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ हमारा भाव जो प्रकृति अतीत । देखने लगो तो कल्पना रहित । मुझमें सभी भूत हैं यह व्यर्थ । सब मैं होनेसे ॥ ७१ ॥ संकल्पके संध्याकालमें जैसे । बुद्धि चक्षु मंद होते तमसे । तत्र अखंडित किंतु अस्पष्टसे । दीखते भूत भिन्न हैं ॥ ७१ ॥ होता जब संकल्प-संध्या लोप । तब अखंडित ही है स्वरूप । संदेह जाते जैसे होता लोप । मालाका सर्पपन ॥ ७३ ॥ मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व उत्पन्न होता है भूमिमेंसे क्या अपने आप । अंकुरते मटकोंके रूप । जैसे कुलाल मतिके छाप । अंकुरते सब ॥ ७४ ॥ है क्या सागरका पानी । बनी तरंगोंकी खानी । है अवांतर करनी । वायुकी वह ॥ ७५ ॥ है क्या कपासका उदर । कपड़ेका बना आगर । ओढण्याको है मनोहर । बना कपड़ा ॥ ७६ ॥ या नहीं मुझमें भूत देख तू दिव्य योग जो । सृजता पालता भूत उनमें रहता नहीं ॥ ५ ॥ २५५ राज-विद्या-समर्पणयोग
होने पर स्वर्णके अलंकार । स्वर्णत्वमें नहीं आता अंतर । नाना रूप उसके मनोहर । भूषितकी दृष्टिसे ॥ ७७ ॥ अजी ! प्रतिध्वनिका प्रत्युत्तर । या क्या प्रतिबिंबका आविष्कार । होता जो प्रति रूप ही आखर । या स्वयं भिन्न वस्तु ॥ ७८ ॥ वैसे है मेरा निर्मल स्वरूप । उसपे होता भूत-भावना आरोप । जिसका भासता है संकल्प । कल्पना रूप ॥ ७९ ॥ मिटती जब प्रकृति कल्पित । भूताभास नहीं रहता पार्थ । फिर शुद्ध स्वरूप अखंडित । रहता मेरा ॥ ८० ॥ जब है सिर चक्कर खा जाता । तब भासता है विश्व फिरता । अपनी कल्पनासे भास होता । भूतोंका अखंडमें ॥ ८१ ॥ वही तू कल्पना छोड़कर देख । मैं भूतोंमें भूत मुझमें अनेक । स्वप्नोंमें भी नहीं होगा सविवेक । विचारने योग्य ॥ ८२ ॥ भूतोंको करता मैं धारण । या भूतोंमें है मेरा जीवन । संकल्प सन्निपात कारण । होती ये बातें ॥ ८३ ॥ इसलिए सुन तू प्रियोत्तम । ऐसा मैं विश्वाका हूँ विश्वात्म । जो हो इस झूठे भूत-ग्राम । आश्रयदाता ॥ ८४ ॥ लेकर जैसे रवि-रश्मिका आधार । मृग-जल मिथ्या भासता भूमि पर वैसा जान भास भूतोंका मुझ पर । और मुझे सत्य ॥ ८५ ॥ ऐसा हूँ मैं भूत-भावन । औ' सब भूतोंसे अभिन्न । जैसे भानु-रश्मि अभिन्न । होते हैं पार्थ ॥ ८६ ॥ यह है ऐश्वर्य-योग हमारा । देखा न तूने भला धनुर्धरा । इसमें है क्या कह तू आसरा । भूत भेदका ॥ ८७ ॥ इसलिए भूत मुझसे । न है भिन्न किसी रूपसे । अथवा हूँ भिन्न भूतोंसे । मैं यह नहीं मानता ॥ ८८ ॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥ आकाशमें महा-वायु रहे सर्वत्र हो सदा । मुझमें हैं सभी भूत रहते जान तू यह ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी २५६
अजी ! आकाश होता जितना जैसा । पवन होता उतना ही औ' वैसा । हिलानेसे भास होता भिन्न ऐसा । नहीं तो उतना ही ॥ ८९ ॥ वैसे भूत मात्र मुझमें । भास होते हैं कल्पनामें । नहीं होता निर्विकल्पमें । वहां मैं ही सर्वत्र ॥ ९० ॥ नहीं औ' है यह कल्पनाका औरस । कल्पना लोपसे होता है वह अंश । कल्पनाके संग होता है भूताभास । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ मिटती है जब कल्पना मूलतः । तब वहां है या नहीं यह जाता । इसलिये तू आगे यह देखता । ऐश्वर्य योग ॥ ९२ ॥ ऐसा है यह प्रति-बोध सागर । अपनेको कर उसकी लहर । तब तू देखेगा सब स-चराचर । आप ही है ॥ ९३ ॥ ज्ञान-जागृति अब अर्जुन । हुई न यह पूछते कृष्ण । अब तो भंग हो द्वैत-स्वप्न । है जो मिथ्या ॥ ९४ ॥ फिर तुझे यदि शायद । आएगी कल्पनाकी नींव । मिटेगा अभेदका बोध । पड़ेगा स्वप्न ॥ ९५ ॥ जिससे टूटेगा निद्राका पथ । उद्बोध-रूप हो आप पार्थ । कहता अब ऐसा गुपित । खोल करके ॥ ९६ ॥ इंद्रियोंके अंतर्मुख होनेसे ईश्वरका अनुभव आता है— तब हे धनुर्धर स-धैर्य । अवधान दे तू धनंजय । सब भूतोंको है यह माया । करती हरनी जो ॥ ९७ ॥ सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ जिसका नाम ही प्रकृति है । तुझसे जो द्विविध कही है । एक अष्ठधा भेद्युत है । दूसरी जीव रूप ॥ ९८ ॥ मेरी प्रकृतिमें सोते भूत कल्पांतमें सभी । जगाता सबको मैं ही कल्प-आरंभमें स्वयं ॥ ७ ॥ २५७ -राज-विद्या-समर्पणयोग (33)
यह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन । इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥ यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती । ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥ ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें । ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥ या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता । जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥ अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर । लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥ तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन । प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥ जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता । इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥ तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति । तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥ लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर । प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥ लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार । वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥ बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख । वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥ प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः । भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी २५८
अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार । थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥ मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे । फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥ स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते । अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥ इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य । चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥ या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे । प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥ पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर । तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥ पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान । उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥ ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार । ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥ जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन । जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥ अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय । गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥ या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र । जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥ स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म । ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥ इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन । करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥ जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता । वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥ २५९ राज-विद्या-समर्पणयोग
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥ उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥ धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर । या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥ जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त । वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥ विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके । किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥ घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती । कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥ जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत । भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥ यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर । पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥ जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित । जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥ किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर । तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥ किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे । रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥ साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर । उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी २६०
इस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित । मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥ या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें । इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥ आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा— है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ । लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥ रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था । नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥ अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे । क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥ जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता । जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥ शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके । समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥ अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । 'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता । तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥ जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली । वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥ या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष । वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥ तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें । न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥ २६१ राज-विद्या-समर्पणयोग
इसीलिए तू धनंजय । भूलेगा यह अभिप्राय । स्थूल दृष्टिका ज्ञानाशय । होगा व्यर्थ ॥ ४३ ॥ स्थूल-दृष्टिसे मुझे पार्थ । देखना है जान तू व्यर्थ । स्वप्नमें पीनेसे अमृत । न होता अमर ॥ ४४ ॥ वैसे स्थूल-दृष्टि है मूढ । जानते समझके दृढ । वह जानना होता आड । स्वरूप ज्ञानके ॥ ४५ ॥ होनेसे जैसा नक्षत्रका आभास । अपना ही घात कर लेता हंस । नीरमें रत्न-बुद्धिकी कर आस । मारकर चोंच ॥ ४६ ॥ गंगा जान गया मृगजल । उस जानेसे मिला क्या फल । सुरतरु समझ बबूल । लगानेसे क्या होगा ? ॥ ४७ ॥ हार मान नीलमणिका दुहरा । पकड लिया विषैला फणिधर । अथवा रत्न मानकर पत्थर । चुनना जैसे ॥ ४८ ॥ या प्रकट हुआ स्वर्ण-भंडार । कहकर उठा लिया अंगार । कूपमें कूदा छाया देखकर । अपनी सिंह ॥ ४९ ॥ मुझको देहधारी मानकर । निश्चय किया है धनुर्धर । उसने चंद्र समझकर । पकडा प्रतिबिंब ॥ १५० ॥ वैसे कृत-निश्चय गया व्यर्थ । कोयी जैसे मांड पीकर पार्थ । देखने लगा सुपरिणामार्थ । अमृतके मानो ॥ ५१ ॥ वैसे नाशवंत स्थूलाकार । चितमें निश्चय बांधकर । परखा अविनाश अक्षर । दीखूंगा मैं कैसे ॥ ५२ ॥ कोयी पश्चिम समुद्रका तट । चलके पहुंचे पूर्वकी बाट । चोकर कूट करके सुभट । मिलेंगे क्या दाने ॥ ५३ ॥ वैसे विकृत जो स्थूल । जानकर मैं केवल । जैसे फेन पीके जल । कैसे पायेगा ? ॥ ५४ ॥ ऐसे मोहग्रस्त मनसे । यही मैं मान संभ्रमसे । देहके जन्मादि कर्मोंसे । लादते मुझे ॥ ५५ ॥ जिससे अनामको नाम । मुझ क्रिया-शून्यको कर्म । अ-शरीरको देह धर्म । आरोपते ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी २६२
मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार । विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥ मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण । औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥ अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान । शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥ वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र । तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥ मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति । सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥ अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण । सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥ मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते । निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥ सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध । एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥ मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता । तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥ अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन । अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥ मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम । सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥ आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता । दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥ अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत । लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥ आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते । वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥ २६३ राज-विद्या-समर्पणयोग
ऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार । करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं- इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ । अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥ या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार । गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥ जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल । लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥ मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ । धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥ फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना । अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥ वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख । या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥ वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ । वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥ तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी । विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥ उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये । इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥ वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी । जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी २६४
जहां लारमें आशाकी । लोटती जिह्वा हिंसाकी । जुगाली करें कौरकी । मोदसे नित ॥ ८१ ॥ जो हैं कान तक अनर्थके । चाटती जीभ बाहर लाके । कोह बन प्रमाद गिरिके । हुई उन्मत्त ॥ ८२ ॥ जहां हैं क्रूर दांत द्वेषके । पीसते हैं बीजको ज्ञानके । आवरण डालते तमके । मूढ-बुद्धि पर ॥ ८३ ॥ आसुरी बुद्धिके मुखमें ऐसे । पडते हैं भूत बलिके कौरसे । भ्रमजालके कुण्डमें पड़नेसे । सुन धनंजय ॥ ८४ ॥ पडे वे ऐसे गर्तमें तमके । न लगते हाथमें विचारके । जहां गये उस स्थानके । निशान भी नहीं ॥ ८५ ॥ मैं भक्तोंके कीर्तन-मेलेमें रहता हूं— यह निष्फल वर्णन तदर्थ । रहने दो मूर्खोंकी बात पार्थ । विस्तार करनेसे वाणी व्यर्थ । थकेगी इससे ॥ ८६ ॥ ऐसे बोले तब देव । "जी" कहा सुन पांडव । सुन वाचा ही नीरव । साधु-कथासे ॥ ८७ ॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ अजी ! जिनका है निर्मल मानस । बसता वहां मैं ले क्षेत्र-सन्यास । नींदमें भी वे करते स-उल्लास । वैराग्याराधना ॥ ८८ ॥ जिनका सद्भाव आलंबन । रहता धर्मका सिंहासन । जिनके मनका है जीवन । विवेकमात्र ॥ ८९ ॥ जो हैं ज्ञान गंगामें स्नात । पूर्णता-भोजनसे तृप्त । शांति-लताके नव-पात । है अति कोमल ॥ १९० ॥ जुटाके संपदा दैवी महात्मा भजते मुझे । अनन्य भावसे जान मैं विश्वारंभ शाश्वत ॥ १३ ॥ (34) २६५ राज-विद्या-समर्पणयोग
पूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार । शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥ भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति । उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥ उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण । उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥ ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव । जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥ बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम । किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥ स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा । किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके । नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥ निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम । थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥ यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना । तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥ ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख । सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥ दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन । तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥ नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती । भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी २६६
राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते । जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥ अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ । मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥ तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल । पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥ बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर । ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥ उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत । पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥ तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता । योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥ किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर । रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥ मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत । कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥ कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध । तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥ नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं-- रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन । तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥ ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता । मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥ बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥ उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥ वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें । कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥ २६७ राज-विद्या-समर्पणयोग
प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥ तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर । फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥ तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय । दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥ फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख । सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥ ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन । अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥ जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें । वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥ आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर । मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥ फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते । सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥ अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते । सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥ जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता । वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥ या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे । वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥ रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान । करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥ नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन । ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥ है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति । ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी २६८
ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है— यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी। की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥ तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।” जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥ सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त। सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥ कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा। किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥ पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?। देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥ यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित। हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥ उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता। चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥ पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट। देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥ कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था। हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥ जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम। कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप। पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥ दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे। विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥ २६९ राज-विद्या-समर्पणयोग
फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण । यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥ वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका । समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥ मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक । शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥ स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे । वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥ जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता । आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥ तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान । एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥ जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना । आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥ अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण । ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥ फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता । इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥ जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?— या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक । तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥ इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान । जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥ शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर । रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी २७०
वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति । उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥ ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर । बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥ या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते । सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥ बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते । फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥ मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये । वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥ वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये । सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥ अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति । बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥ जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य । वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥ अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन । वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥ वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण । इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥ वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे । किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥ यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे । कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं— यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे । यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥ २७१ राज-विद्या-समर्पणयोग
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका । "मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥ तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल । यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥ स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध । आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥ होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता । हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे । जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥ अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी । वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥ जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता । मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥ प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां । वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥ जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ ! उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥ मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं । मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥ जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह । मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी २७२
जहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान । मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥ ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार । उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥ उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार । जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥ इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम । एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण । उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥ जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन । आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥ विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता । हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥ आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना । तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥ पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन । पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥ मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता । मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥ मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल । मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥ साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा । मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥ २७३ राज-विद्या-समर्पणयोग (35)