भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 338

प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥ तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर । फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥ तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय । दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥ फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख । सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥ ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन । अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥ जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें । वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥ आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर । मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥ फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते । सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥ अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते । सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥ जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता । वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥ या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे । वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥ रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान । करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥ नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन । ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥ है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति । ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी २६८