भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते । जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥ अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ । मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥ तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल । पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥ बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर । ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥ उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत । पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥ तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता । योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥ किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर । रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥ मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत । कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥ कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध । तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥ नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं-- रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन । तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥ ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता । मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥ बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥ उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥ वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें । कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥ २६७ राज-विद्या-समर्पणयोग