ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार । शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥ भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति । उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥ उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण । उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥ ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव । जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥ बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम । किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥ स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा । किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके । नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥ निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम । थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥ यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना । तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥ ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख । सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥ दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन । तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥ नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती । भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी २६६