भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है— यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी। की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥ तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।” जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥ सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त। सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥ कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा। किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥ पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?। देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥ यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित। हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥ उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता। चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥ पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट। देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥ कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था। हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥ जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम। कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप। पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥ दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे। विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥ २६९ राज-विद्या-समर्पणयोग