भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण । यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥ वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका । समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥ मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक । शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥ स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे । वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥ जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता । आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥ तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान । एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥ जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना । आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥ अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण । ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥ फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता । इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥ जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?— या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक । तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥ इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान । जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥ शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर । रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी २७०